दर्शन

User Rating: 0 / 5

Star InactiveStar InactiveStar InactiveStar InactiveStar Inactive
 

दर्शनशास्त्र (अंग्रेजी:Philosophy) वह ज्ञान है जो परम सत्य और प्रकृति के सिद्धांतों और उनके कारणों की विवेचना करता है। दर्शन यथार्थ की परख के लिये एक दृष्टिकोण है। दार्शनिक चिन्तन मूलतः जीवन की अर्थवत्ता की खोज का पर्याय है। वस्तुतः दर्शनशास्त्र स्वत्व, अर्थात प्रकृति तथा समाज और मानव चिंतन तथा संज्ञान की प्रक्रिया के सामान्य नियमों का विज्ञान है। दर्शनशास्त्र सामाजिक चेतना के रूपों में से एक है। Philosophy के अर्थों में दर्शनशास्त्र पद का प्रयोग सर्वप्रथम पाइथागोरस ने किया था। विशिष्ट अनुशासन और विज्ञान के रूप में दर्शन को प्लेटो ने विकसित किया था। उसकी उत्पत्ति दास-स्वामी समाज में एक ऐसे विज्ञान के रूप में हुई जिसने वस्तुगत जगत तथा स्वयं अपने विषय में मनुष्य के ज्ञान के सकल योग को ऐक्यबद्ध किया था। यह मानव इतिहास के आरंभिक सोपानों में ज्ञान के विकास के निम्न स्तर के कारण सर्वथा स्वाभाविक था। सामाजिक उत्पादन के विकास और वैज्ञानिक ज्ञान के संचय की प्रक्रिया में भिन्न भिन्न विज्ञान दर्शनशास्त्र से पृथक होते गये और दर्शनशास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में विकसित होने लगा। जगत के विषय में सामान्य दृष्टिकोण का विस्तार करने तथा सामान्य आधारों व नियमों का करने, यथार्थ के विषय में चिंतन की तर्कबुद्धिपरक, तर्क तथा संज्ञान के सिद्धांत विकसित करने की आवश्यकता से दर्शनशास्त्र का एक विशिष्ट अनुशासन के रूप में जन्म हुआ। पृथक विज्ञान के रूप में दर्शन का आधारभूत प्रश्न स्वत्व के साथ चिंतन के, भूतद्रव्य के साथ चेतना के संबंध की समस्या है।

दर्शन और फिलॉस्फी

प्रायः फिलॉस्फी को दर्शन का अंग्रेजी समानार्थक समझा जाता है परंतु दोनों में स्पष्ट अंतर है। भारतीय दर्शन और 'फिलासफी' (en:Philosophy) एक नहीं क्योंकि दर्शन यथार्थता, जो एक है, का तत्वज्ञान है जबकी फिलासफी विभिन्न विषयों का विश्लेषण। इसलिये दर्शन में चेतना की मीमांसा अनिवार्य है जो पाश्चात्य फिलासफी में नहीं। मानव जीवन का चरम लक्ष्य दुखों से छुटकारा प्राप्त करके चिर आनंद की प्राप्ति है। समस्त दर्शनों का भी एक ही लक्ष्य दुखों के मूल कारण अज्ञान से मानव को मुक्ति दिलाकर उसे मोक्ष की प्राप्ति करवाना है। यानी अज्ञान व परंपरावादी और रूढ़िवादी विचारों को नष्ट करके सत्य ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है। सनातन काल से ही मानव में जिज्ञासा और अन्वेषण की प्रवृत्ति रही है। प्रकृति के उद्भव तथा सूर्य, चंद्र और ग्रहों की स्थिति के अलावा परमात्मा के बारे में भी जानने की जिज्ञासा मानव में रही है। इन जिज्ञासाओं का शमन करने के लिए उसके अनवरत प्रयास का ही यह फल है कि हम लोग इतने विकसित समाज में रह रहे हैं। परंतु प्राचीन ऋषि-मुनियों को इस भौतिक समृद्धि से न तो संतोष हुआ और न चिर आनंद की प्राप्ति ही हुई। अत: उन्होंने इसी सत्य और ज्ञान की प्राप्ति के क्रम में सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं गूढ़तम साधनों से ज्ञान की तलाश आरंभ की और इसमें उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। उसी सत्य ज्ञान का नाम दर्शन है।

दृश्यतेह्यनेनेति दर्शनम् (दृष्यते हि अनेन इति दर्शनम्)

अर्थात् असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है। पाश्चात्य फिलॉस्पी शब्द फिलॉस (प्रेम का)+सोफिया (प्रज्ञा) से मिलकर बना है। इसलिए फिलॉसफी का शाब्दिक अर्थ है बुद्धि प्रेम। पाश्चात्य दार्शनिक (फिलॉसफर) बुद्धिमान या प्रज्ञावान व्यक्ति बनना चाहता है। पाश्चात्य दर्शन के इतिहास से यह बात झलक जाती है कि पाश्चात्य दार्शनिक ने विषय ज्ञान के आधार पर ही बुद्धिमान होना चाहा है। इसके विपरीत कुछ उदाहरण अवश्य मिलेंगें जिसमें आचरण शुद्धि तथा मनस् की परिशुद्धता के आधार पर परमसत्ता के साथ साक्षात्कार करने का भी आदर्श पाया जाता है। परंतु यह आदर्श प्राच्य है न कि पाश्चात्य। पाश्चात्य दार्शनिक अपने ज्ञान पर जोर देता है और अपने ज्ञान के अनुरूप अपने चरित्र का संचालन करना अनिवार्य नहीं समझता। केवल पाश्चात्य रहस्यवादी और समाधीवादी विचारक ही इसके अपवाद हैं।

भारतीय दर्शन में परम सत्ता के साथ साक्षात्कार करने का दूसरा नाम ही दर्शन हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार मनुष्य को परम सत्ता का साक्षात् ज्ञान हो सकता है। इस प्रकार साक्षात्कार के लिए भक्ति ज्ञान तथा योग के मार्ग बताए गए हैं। परंतु दार्शनिक ज्ञान को वैज्ञानिक ज्ञान से भिन्न कहा गया है। वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने में आलोच्य विषय में परिवर्तन करना पड़ता है ताकि उसे अपनी इच्छा के अनुसार वश में किया जा सके और फिर उसका इच्छित उपयोग किया जा सके। परंतु प्राच्य दर्शन के अनुसार दार्शनिक ज्ञान जीवन साधना है। ऐसे दर्शन से स्वयं दार्शनिक में ही परिवर्तन हो जाता है। उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। जिसके द्वारा वह समस्त प्राणियों को अपनी समष्टि दृष्टि से देखता है। समसामयिक विचारधारा में प्राच्य दर्शन को धर्म-दर्शन माना जाता है और पाश्चात्य दर्शन को भाषा सुधार तथा प्रत्ययों का स्पष्टिकरण कहा जाता है।

दर्शनशास्त्र का क्षेत्र[संपादित करें]

दर्शनशास्त्र अनुभव की व्याख्या है। इस व्याख्या में जो कुछ अस्पष्ट होता है, उसे स्पष्ट करने का यत्न किया जाता है। हमारी ज्ञानेंद्रियाँ बाहर की ओर खुलती हैं, हम प्राय: बाह्य जगत् में विलीन रहते हैं। कभी कभी हमारा ध्यान अंतर्मुख होता है और हम एक नए लोक का दर्शन करते हैं। तथ्य तो दिखाई देते ही हैं, नैतिक भावना आदेश भी देती है। वास्तविकता और संभावना का भेद आदर्श के प्रत्यय को व्यक्त करता है। इस प्रत्यय के प्रभाव में हम ऊपर की ओर देखते हैं। इस तरह दर्शन के प्रमुख विषय बाह्य जगत्, चेतन आत्मा और परमात्मा बन जाते हैं। इनपर विचार करते हुए हम स्वभावत: इनके संबंधो पर भी विचार करते हैं। प्राचीन काल में रचना और रचयिता का संबंध प्रमुख विषय था, मध्यकाल में आत्मा और परमात्मा का संबंध प्रमुख विषय बना और आधुनिक काल में पुरुष और प्रकृति, विषयी और विषय, का संबंध विवेन का केंद्र बना। प्राचीन यूनान में भौतिकी, तर्क और नीति, ये तीनों दर्शनशास्त्र के तीन भाग समझे जाते थे। भौतिकी बाहर की ओर देखती है, तर्क स्वयं चिंतन को चिंतन का विषय बनाता है, नीति जानना चाहती है कि जीवन को व्यवस्थित करने के लिए कोई निरपेक्ष आदेश ज्ञात हो सकता है या नहीं।

तत्वज्ञान में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

1. ज्ञान के अतिरिक्त ज्ञाता और ज्ञेय का भी अस्तित्व है या नहीं?

2. अंतिम सत्ता का स्वरूप क्या है? वह एक प्रकार की है, या एक से अधिक प्रकार की?

प्राचीन काल में नीति का प्रमुख लक्ष्य नि:श्रेयस के स्वरूप को समझना था। आधुनिक काल में कांट ने कर्तव्य के प्रयत्य को मौलिक प्रत्यय का स्थान दिया। तृप्ति या प्रसन्नता का मूल्यांकन विवाद का विषय बना रहा है।

ज्ञानमीमांसा में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

1. ज्ञान क्या है?

2. ज्ञान की संभावना भी है या नहीं?

3. ज्ञान प्राप्त कैसे होता है?

4. मानव ज्ञान की सीमाएँ क्या हैं?

ज्ञानमीमांसा ने आधुनिक काल में विचारकों का ध्यान आकृष्ट किया। पहले दर्शन को प्राय: तत्वज्ञान (मेटाफिजिक्स) के अर्थ में ही लिया जाता था। दार्शनिकों का लक्ष्य समग्र की व्यवस्था का पता लगाना था। जब कभी प्रतीत हुआ कि इस अन्वेषण में मनुष्य की बुद्धि आगे जा नहीं सकती, तो कुछ गौण सिद्धांत विवेचन के विषय बने। यूनान में, सुकरात, प्लेटो और अरस्तू के बाद तथा जर्मनी में कांट और हेगल के बाद ऐसा हुआ। यथार्थवाद और संदेहवाद ऐसे ही सिद्धांत हैं। इस तरह दार्शनिक विवेचन में जिन विषयों पर विशेष रूप से विचार होता रहा है, वे ये हैं-

(1) मुख्य विषय -

(2) गौण विषय -

इन विषयों को विचारकों ने अपनी अपनी रुचि के अनुसार विविध पक्षों से देखा है। किसी ने एक पक्ष पर विशेष ध्यान दिया है, किसी ने दूसरे पक्ष पर। प्रत्येक समस्या के नीचे उपसमस्याएँ उपस्थित हो जाती हैं।

भारतीय दर्शन

विस्तृत विवरण के लिये भारतीय दर्शन देखें।

वैसे तो समस्त दर्शन की उत्पत्ति वेदों से ही हुई है, फिर भी समस्त भारतीय दर्शन को आस्तिक एवं नास्तिक दो भागों में विभक्त किया गया है। जो ईश्वर तथा वेदोक्त बातों जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत पर विश्वास करता है, उसे आस्तिक माना जाता है; जो नहीं करता वह नास्तिक है।

आस्तिक या वैदिक दर्शन[संपादित करें]

वैदिक परम्परा के ६ दर्शन हैं :

(1) मीमांसा (2) न्याय (3) वैशेषिक (4) सांख्य (5) योग (6) वेदान्त

यह दर्शन पराविद्या, जो शब्दों की पहुंच से परे है, का ज्ञान विभिन्न दृष्टिकोणों से समक्ष करते हैं। प्रत्येक दर्शन में अन्य दर्शन हो सकते हैं, जैसे वेदान्त में कई मत हैं।

नास्तिक या अवैदिक दर्शन

नोट - अक्सर लोग समझते है की जो ईश्वर को नहीं मानता वह नास्तिक है पर यहाँ नास्तिक का अर्थ वेदों को न मानने से है इसलिए ऊपर दिए गए तीनो दर्शन नास्तिक दर्शन में आते है ]

वार्ताः

{source}
<!-- You can place html anywhere within the source tags -->
<iframe src="https://www.youtube.com/embed/?listType=user_uploads&list=sanskritanews" width="auto" height="auto"></iframe>

<script language="javascript" type="text/javascript">
// You can place JavaScript like this

</script>
<?php
// You can place PHP like this

?>
{/source}
{source}
<!-- You can place html anywhere within the source tags -->


<script language="javascript" type="text/javascript">
// You can place JavaScript like this
<script type="text/javascript">
$(function() {
$(this).bind("contextmenu", function(e) {
e.preventDefault();
});
});
</script>
<script type="text/JavaScript">
function killCopy(e){ return false }
function reEnable(){ return true }
document.onselectstart=new Function ("return false");
if (window.sidebar)
{
document.onmousedown=killCopy;
document.onclick=reEnable;
}
</script>

</script>
<?php
// You can place PHP like this

?>
{/source}

श्री भवानी अष्टकम

 ॥**अन्नकूट महोत्सव की ह्रदय से हार्दिक शुभकामनाएं*

*श्री भ [ ... ]

अधिकम् पठतु
भगवान धनवंतरि कौन

कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान धन्वन्त [ ... ]

अधिकम् पठतु
सप्तशती विवेचन

|| सप्तशती विवेचन ||
मेरुतंत्र में व्यास द्वारा कथित तीनो च [ ... ]

अधिकम् पठतु
धनतेरस २०१७ विशेष

धनतेरस 2017 :-
यह पर्व प्रति वर्ष कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की  [ ... ]

अधिकम् पठतु
दीपावली के अचूक मंत्र...

🌻🌻दीपावली के अचूक मन्त्र 🌻🌻
दीपावली कि रात्रि जागरण कि  [ ... ]

अधिकम् पठतु
धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं- जानें धनतेरस पूजन वि...

©*धनतेरस पूजन विधि*
( घर में धन धान्य वृद्धि और सुख शांति के  [ ... ]

अधिकम् पठतु
उपमालङ्कारः

उपमालङ्कारस्तु एकः अर्थालङ्कारः वर्तते । 'उपमा कालिदासस [ ... ]

अधिकम् पठतु
रावणः

रावणः ( ( शृणु) (/ˈrɑːvənəhə/)) (हिन्दी: रावन, आङ्ग्ल: Ravan) रामायणस्य म [ ... ]

अधिकम् पठतु
शारदा देवी मंदिर

शारदा देवी मंदिर मध्य प्रदेश के सतना ज़िले में मैहर शहर म [ ... ]

अधिकम् पठतु
विंध्यवासिनी का इतिहास...

🔱जय माँ विंध्यवासिनी🔱* *विंध्यवासिनी का इतिहास* *भगवती  [ ... ]

अधिकम् पठतु
हकीकतरायः

हकीकतरायः कश्चन स्वतन्त्रसेनानी बालकः आसीत्, यः मुस्लिम [ ... ]

अधिकम् पठतु
भारतीय-अन्तरिक्ष-अनुसन्धान-सङ्घटनम् (ISRO)...

भारतीय-अन्तरिक्ष-अनुसन्धान-सङ्घटनम् (इसरो, आङ्ग्ल: Indian Space Res [ ... ]

अधिकम् पठतु
ऐतरेयोपनिषत्

ऐतरेयोपनिषत् (Aitareyopanishat) ऋग्वेदस्य ऐतरेयारण्यके अन्तर्गता  [ ... ]

अधिकम् पठतु
आहुति के दौरान “स्वाहा” क्यों कहा जाता है?...

Swaha आहुति के दौरान “स्वाहा” क्यों कहा जाता है?...

स्वाहा का म [ ... ]

अधिकम् पठतु
वैदिक ब्राह्मणों को वर्ष भर में आत्मशुद्धि का अवसर...

Importance of rakhi
वैदिक ब्राह्मणों को वर्ष भर में आत्मशुद्धि का अवस [ ... ]

अधिकम् पठतु
अन्य लेख
लिप्याधिकार © देववाणी (Devwani). सर्वाधिकार सुरक्षित