^शिखरं प्रत्यागच्छसि
  
  
  
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सनातनप्रश्नावलिः

॰ सृष्टि तत्त्व , ज्योतिष , नित्य कृत्य , सूत्र , वर्णभेद और युग धर्म का वर्णन जिसमें हो उसे यामल कहते हैं ।

  • ॰ वैदिक विधि वाक्यों द्वारा जिनकी कर्तव्यता का ज्ञान हो उसे धर्म कहते हैं । जिसमें अभ्युदय तथा श्रेयस सिद्धि हो उसे धर्म कहते हैं ।
  • धर्म के दस लक्षण मनु महाराज ने बताए हैं -धृति,क्षमा,दम,अस्तेय,शौच, इन्द्रिय निग्रह ,धी,विद्या, सत्य और अक्रोध इन लक्षणों को धारण करने वाला सनातन धर्मी है।
  • अच्छे कर्मों के आचरण को धर्म कहते हैं । जिन कर्मों के करने से उन्नति हो और सच्चा सुख मिले उन कर्मों के आचरण को धर्म कहते हैं ।

धर्म का पालन करने से ही मनुष्य उन्नति कर सकता है और सच्चा सुख पा सकता है, अगले जन्मों में क्रमशः उन्नति करते हुए मुक्ति को प्राप्त करता है। इसलिए धर्म का पालन करना आवश्यक है।

॰ गुरु मुख से जिसका श्रवण किया हो  जिसका कोई कर्त्ता न हो उसे श्रुति कहते हैं" श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो " ।

॰ जिसमें प्रझा के लिये आचार - विचार - व्यवहार की व्यवस्था तथा समाज के शासन निमित्र निति और सदाचार सम्बन्धी नियम स्पष्टता पूर्वक हो उसे स्मृति कहते हैं । इसी को धर्मशास्त्र भी कहते हैं ।

॰ धर्मशास्त्र के निर्माता महर्षि गण हैं । जिन्हें समाधि में वैदिक तत्त्वों का ज्ञान होता है वे ही धर्मशास्त्र के निर्माता व प्रवर्तक कहे जाते हैं जैसे - मनु , अत्रि , विष्णु ,हारित , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगिरा , यम , आपस्तम्ब , सम्वर्त , कात्यायन ,वृहस्पति , पराशर , व्यास , शंख , लिखित , दक्ष , गौतम , शातातप , वसिष्ठादि ।

॰ जिसमें सृष्टि , 

प्रळ , देवताओं की पूजा , सर्व कार्यों के साधन , पुरश्चरण ,षट्कर्म साधन और चार प्रकार के ध्यान योग का वर्णन हो उसे आगम कहते हैं 

॰ जिसमें धर्माधर्म का निर्णय मिले उसे धर्मशास्त्र कहते हैं । इसे स्मृति भी कहते हैँ ।

॰ जिसमें ग्रह , नक्षत्र उनकी गति एवं काल गणना का वर्णन है वह ज्योतिष है 

 

॰ सनातन परमात्मा ने सनातन जीवों के सनातन निःश्रेयस एवं अभ्युदय के लिए जिन सनातन परम कल्याणकारी नियमों का निर्देश जिसमें किया हो उसे सनातन धर्म कहते है।

॰ शुल्बसूत्र , कुण्डाक्रकुण्डकल्पतरु , कुण्डरत्नावलि में यज्ञकुण्ड और मण्डपादि बनाने का विधान है ।

  • सृष्टि , लय , मंत्र निर्णय , देवताओं के संस्थान , यंत्र निर्णय , तीर्थ , आश्रम धर्म, कल्प , ज्योतिष संस्थान , व्रत कथा , शौच , आशौच , स्त्री पुरुष लक्षण , राज धर्म , दान धर्म , व्यवहार तथा आध्यात्मिक विषयों जिसमें वर्णन हो उसे तन्त्र कहते हैं
  •  शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष तथा छन्द ये 6 छः वेद के अङ्ग हैं ।
  • पद निर्वाचन अर्थात् शब्दों के अर्थ करने को प्रणाली का वर्णन जिसमें हो उसे निरुक्त कहते हैं।
  • चारों वेदों के चार उपवेद हैं । ऋग्वेदका उपवेद आयुर्वेध , यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद , सामवेद का उपवेद गान्धर्ववेद , अथर्ववेद का उपवेद स्थापत्य - कला व अर्थशास्त्र है ।

 8 आठ वसु , 11 ग्यारह रुद्र , 12 आदित्य , 1 एक प्रजापति और 1 एक वषट्कार । इस प्रकार कुल 33 तैंतीस देवता होते हैं ।

12 आदित्य - अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, वैवस्वत और विष्णु

8 वसु - आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रभाष

11 रूद्र - मनु, मन्यु, शिव, महत, ऋतुध्वज, महिनस, उम्रतेरस, काल, वामदेव, भव और धृत-ध्वज

2 अश्विनी - अश्विनी तथा कुमार (कुछ लोग इंद्र तथा प्रजापति के स्थान पर अश्विनी कुमारों को मानते हैं।

  • वेद मन्त्रों के उच्चारण के लिये प्रयुक्त होने वाले उदात्त - अनुदात्त - स्वरित स्वरों के नियमों का वर्णन जिसमें हो उसे शिक्षा कहते हैं ।
  • शिक्षा में ज्ञान, उचित आचरण और तकनीकी दक्षता, शिक्षण और विद्या प्राप्ति आदि समाविष्ट हैं।
  • शिक्षा वह साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति न केवल अपना भविष्य निर्धारित करता है। बल्कि अपने भविष्य को सुरक्षित भी करता है।
  • साध्य , साधन , कर्त्ता , कर्म , क्रिया , समासादि का निरुपण एवं शब्द के व्युत्पादन तथा भाषा के नियमों का वर्णन जिसमें हो उसे व्याकरण कहते हैं ।
  • लौकिक वैदिक पदों के यति विराम आदि को व्यवस्थित करने का वर्णन जिसमें हो उसे छन्द कहते हैं । छन्द दो प्रकार के होते हैं । लौकिक तथा वैदिक , मात्रा छन्द व वर्ण छन्द ।
  •  किसी भी पदार्थ के वास्ताविक स्वरूप का ज्ञान जिस साधन के द्वारा होता है , या जिससे पदार्थ का यथार्थ रूप प्रकट होता है उसे विद्या कहते हैं , उसके विपरीत अविद्या कहलाती है ।
  • विद्या के चार क्षेत्र हैं :- 

(क) आन्वीक्षकि (ख) त्रयी (ग) वार्ता (घ) दण्डनीति

(क) आन्वीक्षकि :- पूर्ण ब्रह्म विद्या जिसमें वैदिक दर्शन, उपनिषद् आदि का समावेष है जो जड़-चेतन, आत्मा-अनात्मा के विवेचन को तर्क प्रणाली से प्रस्तुत करते हैं ।

(ख) त्रयी :- हर प्रकार के कर्मकाण्ड जिनमें यज्ञादि,उपासना, अध्यात्म ज्ञान, विवाहकर्म,उपनयन, अश्वमेध, नरमेध यज्ञादि सबका समावेष हो ।

(ग) वार्ता :- जिसमें जीवनोभूत विद्याओं का समावेष हो जैसे कृषि , उद्योग, वाणिज्य, पशुपालन , सेवा, शिल्प आदि ।

(घ) दण्डनीति :- प्रजापालन, आन्तर और बाह्य कारणों से राष्ट्र की रक्षा, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, राजनीति शास्त्र , से सब प्रकार के अस्त्रों शस्त्रों का संचय ताकि राष्ट्र द्रोहीयों को मृत्यु के मुख में शीघ्र ही धकेला जा सके ।

तो इन चार क्षेत्रों में से हर मनुष्य अपने योग्य विद्या चुन कर किसी भी वर्ण को प्राप्त हो सकता है , यही महर्षि मनु की वर्ण व्यवस्था का मूलभूत आधार है । इसी के आधार पर आर्यों ने विश्व पर चक्रवर्ती शासन किया है । यही वो विद्या है जो गुरुकुलों में पढ़ाई जाती रही है ।

  • सूर्य नक्षत्र से वजित अहोरात्र की जो संधि है तत्त्वदर्शी हमारे पूर्वज ऋषि - मुनियों ने उसी को संध्या कहा है ।

॰ संध्या का समय सूर्योदय से पूर्व ब्राह्मण के लिए दो मुहूर्त है । क्षत्रिय के लिए इससे आधा और उससे आधा वैश्य के लिए ।

 

¤ ताराओं से युक्त समय अति उत्तम समय है । ताराओं के लुप्त हो जाने पर मध्यम ।  सूर्य सहित अधम । इस प्रकार प्रातः संध्या तीन प्रकार की है ।

  • जिसमें वैदिक मंत्रों के ऋषि देवता छन्दों के साथ साथ यज्ञादिक एवं संस्कारों की विधि तथा प्रयोगों का निर्देशन हो उसे कल्प कहते हैं ।
  • वैदिक समय गणनानुसार-
  • कल्प का मान : परमेष्ठी मंडल स्वायम्भू मंडल का परिभ्रमण कर रहा है यानी आकाशगंगा अपने से ऊपर वाली आकाशगंगा का चक्कर लगा रही है। इस काल को कल्प कहा गया यानी इसकी माप है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष (4,32,00,00,000)। इसे ब्रह्मा का 1 दिन कहा गया। जितना बड़ा दिन, उतनी बड़ी रात अत: ब्रह्मा का अहोरात्र यानी 864 करोड़ वर्ष हुआ।

॰ जो द्विज प्रतिदिन संध्या करता है वह पाप रहित होकर सनातन ब्रह्मलोक में जाता है ।

¤ जितने भी इस पृथ्वी पर विकर्मस्थ द्विज हैं उनके पवित्र करने के लिए स्वयंभू ब्रह्मदेव ने संध्या का निर्माण किया है ।

¤ रात्रि में तथा दिन में जो भी अज्ञान अर्थात् पाप किया गया हो वह तीनों काल की संध्या - वन्दन से नष्ट हो जाता है 

  • जिसने संध्या को नहीँ जाना तथा उपासना भी नहीं की वह जिवित अछूत है और संध्या न करने पर कुत्ते की योनी में जन्मता है ।
  • संध्या न करने वाला सदा अपवित्र है सभी कार्यों के अयोग्य है दूसरा भी यदि कोई काम करता है तो उसका फल नहीं मिलता ।
  •  प्रातःकाल की संध्या - गायत्री - ब्रह्मरूपा , मध्याह्न संध्या - सावित्री - रुद्ररूपा और सायं काल की संध्या - सरस्वती - विष्णुरूपा है ।
  • शरीर को धरण करने का नाम जन्म है।
  • जन्म जीव का होता है।
  • पाप-पुण्य कर्मों का फल भोगने के लिए जन्म होता है।
  • आत्मा के शरीर से अलग होने को मृत्यु कहते हैं या शरीर क्रियाओं और कर्मों के बंद हो जाने को मृत्यु कहते हैं।
  • शरीर में दो तरह की तरंगे होती हैं भौतिक तरंग और मानसिक तरंग। जब किसी कारणवश इन दोनों का संपर्क टूट जाता है तो व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। साधारणत: मौत तीन प्रकार से होती है- भौतिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक।किसी दुर्घटना या बीमारी से मृत्यु का होना भौतिक कारण की श्रेणी में आता है। इस समय भौतिक तरंग अचानक मानसिक तरंगों का साथ छोड़ देती है और शरीर प्राण त्याग देता है। जब अचानक किसी ऐसी घटना-दुर्घटना के बारे में सुनकर, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, मौत होती है तो ऐसे समय में भी भौतिक तरंगें मानसिक तरंगों से अलग हो जाती है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह मृत्यु का मानसिक कारण है।मौत का तीसरा कारण आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक साधना में मानसिक तरंग का प्रवाह जब आध्यात्मिक प्रवाह में समा जाता है तब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि भौतिक शरीर अर्थात भौतिक तरंग से मानसिक तरंग का तारतम्य टूट जाता है। ऋषि मुनियों ने इसे महामृत्यु कहा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार महामृत्यु के बाद नया जन्म नहीं होता और आत्मा जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है।
  • जन्म मृत्यु किसी जीव का होता है।
  • जन्म-मृत्यु के बंधन से छूट जाना ही मुक्ति है।
  • मुक्ति आत्मा की होती है।
  • सत्य, संयम, विद्या प्राप्ति और धर्माचरण करने से मुक्ति प्राप्त होती है।
  • श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार विद्या प्राप्ति के 4 उपाय हैं।
  • श्रवण- ध्यान से सुनना, मनन- सुने हुए पर एकांत में विचार करना, निदिध्यासन- विवेचन करना, साक्षात्कार- सही ज्ञान को प्राप्त कर लेना।

 आत्मा अपरिवर्तनशील सर्वव्यापी अजन्मा अव्यक्त और विकार रहित है लेकिन प्रकृति विकारवाली और परिवर्तनशील है और प्रकृति और आत्मा के  मिलनें से ही सृष्टी का निर्माण होता है।

हाँ, सभी शरीरों में आत्मा एक समान होता है।

गीता’ में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है कि मैंने गुण और कर्म के आधार पर चार वर्णो का निर्माण किया है। पुराणों में भी अनेक स्थानों पर ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्र को क्रमशः शुक्लरक्तपीत और कृष्ण कहा है। वर्ण’ शब्द का अर्थ इस प्रकार विवादस्पद है। किन्तु यह निश्चित है कि प्राचीन सामाजिक विभाजन ब्राह्मणोंक्षत्रियोंवैश्यों और शूद्रों में था जिसका अन्तर्निहित उद्देश्य सामाजिक संगठनसमृद्धिसुव्यवस्था को बनाये रखना था।                      

वर्ण की उत्पत्ति

हमारे धर्म ग्रन्थों ने वर्ण की उत्पत्ति की विस्तार से व्याख्या की है।

प्राचीन आदर्श वर्ण व्यवस्था यद्यपि आज पूर्णतया विकृत हो चुकी है और आज इसका समाज में कोई अस्तित्व नहीं है। वर्ण व्यवस्था के सम्बन्ध में ऋग्वेद के पुरुषसूक्त’ में निम्नलिखित श्लोक मिलता है -

ब्राह्मणों स्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।

ऊरु  तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।” 1

अर्थात् ईश्वर ने स्वयं चार वर्णों की सृष्टि की। इन वर्णों का जन्म उसके शरीर के विभिन्न अंगों से हुआ,मुख से ब्राह्मण कीबाहु से क्षत्रिय कीऊरु से वैश्य की और पैंरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई। मुख शरीरांगों में सर्वोच्च है तथा उसका काम बोलना मननचिन्तन हैतद्हेतु ब्राह्मण वर्ण का कार्य भी पठन-पाठनकथा-वाचन व प्रवचन नियत किया गया। बाहु भौतिक बल की प्रतीक है। इनके द्वारा ही रक्षणभरण-पोषणआदि कार्य होता है। अतएव क्षत्रिय का प्रथम धर्म प्रजा रक्षण माना गया है। आक्रमणआप्ति आदि से रकषा करना उसका कर्तव्य है। इन्द्रिय संयमयज्ञानुष्ठानसत्य भाषणन्याय का रक्षणसेवकों का भरण-पोषणअपराधी को दण्ड देनाधार्मिक कार्यों का सम्पादन आदि कर्म क्षत्रिय का धर्म माने गए। इसी हेतु वे समाज रक्षक बने और उन्हें प्रजा पालन का काम सौंपा गया। ऊरु उत्पादन की द्योतक है। तद्हेतु वाणिज्य व्यापार द्वारा उत्पादन वैश्यों का प्रमुख कर्तव्य माना गया। व्यापारब्याज लेनापशुपालनखेतीये सब वैश्यों के सनातन धर्म माने गए। पैर का स्थान सबसे नीचे है और वह सेवा का प्रतीक है। इसलिए ही शूद्रों का समाज में निम्न स्थान माना गया और द्विजों की सेवा-पूजा उनका कर्तव्य। महाभारत में भी शूद्र का परम कर्तव्य तीनों वर्णों की सेवा करना बताया गया। इसी प्रकार मनु’ ने मनुस्मृति’ में लिखा है कि शूद्रों का कार्य तीनों वर्णों के लोगों की बिना किसी ईर्ष्या भाव से सेवा करना है। स्पष्ट है कि चारों वर्णों में ब्राह्मण और क्षत्रिय को लगभग समान महत्व दिया गयाब्राह्मण को ज्ञानीक्षत्रिय को शूरवीरवैश्यों को धन का स्वामीव शूद्रों को सर्वसेवक कहा गया। चिन्तक श्री अरविन्द’ के अनुसार समाज  में मननचिन्तनपठन-पाठन में संलग्न ब्राह्मणों का सर्वोच्च स्थान माना गया, तदनन्तर प्रजा रक्षण व राज्य की देख भाल करने वाले क्षत्रियों का द्वितीय तथा सबसे अन्तिम किन्तु आदृत स्थान वाणिज्य व्यापार करने वाले वैश्यों को माना गया।” 

महाभारत में भी विभिन्न वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख इस प्रकार किया गया है कि उस पुरुष को हमारा प्रणाम है जो ब्राह्मणों को मुख मेंक्षत्रियों को बाहुओं मेंवैश्यों को ऊरु मेंतथा शूद्रों को पैरों में धारण किये है।

 निःसन्देह व्यक्ति के गुण उसे जन्म से ही प्राप्त होते हैंपूर्व जन्म में जो कर्म किए गए हों उन्हीं के अनुसार उसके गुणों का निश्चय होता है। वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म है’ - हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य का वर्ण निर्धारण कर्म और गुणों के आधार पर ही होता है जैसा किमनुने मनुस्मृति’ में बताया है 

शूद्रो बा्रह्मणतामेति ब्राह्मणश्चेति शूद्रताम्।

क्षत्रियाज्जात्मेवन्तु  विद्याद्  वैश्यात्तथैव च।।” 3

अर्थात् शूद्र कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मणक्षत्रिय के समान गुणकर्म स्वभाव वाला होतो वह शूद्र,ब्राह्मणक्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। वैसे ही जो ब्राह्मणक्षत्रिय और वैश्य कुल में उत्पन्न हुआ होउसके गुण व कर्म शूद्र के समान होतो वह शूद्र हो जाता हैवैसे ही क्षत्रिय या वैश्य कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण व शूद्र के समान होने परब्राह्मण व शूद्र हो जाता है। ऋग्वेद में भी वर्ण विभाजन का आधार कर्म ही है। निःसन्देह गुणों और कर्मो का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि वह सहज ही वर्ण परिवर्तन कर देता हैयथा विश्वामित्र जन्मना क्षत्रिय थे,लेकिन उनके कर्मो और गुणों ने उन्हें ब्राह्मण की पदवी दी। राजा युधिष्ठिर ने नहुष से ब्राह्मण के गुण - यथादान,क्षमादयाशील चरित्र आदि बताए। उनके अनुसार यदि कोई शूद्र वर्ण का व्यक्ति इन उत्कृष्ट गुणों से युक्त  हो तो वह ब्राह्मण माना जाएगा। भागवत पुराण’ भी गुणों को ही वर्ण निर्धारण का प्रमुख आधार घोषित करता है। प्रख्यात दार्शनिक राधा कृष्णन’ भी गुण और कर्म के आधार पर वर्ण विभाजन मानते हैं। वर्ण व्यवस्था को वे कर्म प्रधान व्यवस्था कहते हैं। डा.धुरिये’ के अनुसार वर्णमानव रंग से संबंधित है। प्राचीनकाल में मानव समाज में आर्य तथा दस्यु’ दो वर्ण थे। द्रविड़ों को पराजित करने वाले आर्य शनैः शनैः स्वयं की द्विज कहने लगे। बाद में आर्यो तथा द्विजों की वृद्धि होने पर उनके कर्म भी विविध प्रकार के हो गए। तभी उनके विविध कर्मो के आधार पर ब्राह्मण,क्षत्रियवैश्य व शूद्र इन चार वर्णो की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार आपस्तम्ब सूत्रों’ में भी यही बात कही गई है कि वर्णजन्मना’ न होकर वास्तव में कर्मणा’ हता है -

धर्मचर्ययाजधन्योवर्णः पूर्वपूर्ववर्णमापद्यतेजातिपरिवृत्तौ।

अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जधन्यं जधन्यं वर्णमापद्यते जाति परिवृत्तौ।।4

अर्थात् धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जाता है - जिस-जिस के वह  योग्य होता है । वैसे ही अधर्म आचरण से पूर्व अर्थात् उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने से नीचे-नीचे वाले वर्ण को प्राप्त होता है और उसी वर्ण में गिना जाता है।

पुनर्जन्म का वैज्ञानिक कारण यह है क्लिक कर विस्तार से पढें

पुनर्जन्म एक सत्य है-Dr. Ian Stevenson's Reincarnation Research

प्रश्नकर्ता : जीवात्मा मरता है, फिर वापस आता है न?

 

दादाश्री : ऐसा है न, फॉरेनवालों का वापस नहीं आता है, मुस्लिमों का वापस नहीं आता है, लेकिन आपका वापस आता है। आप पर भगवान की इतनी कृपा है कि आपका वापस आता है। यहाँ से मरा कि वहाँ दूसरी योनि में पैठ गया होता है। और उनका तो वापस नहीं आता।

 

अब वास्तव में वापस नहीं आते, ऐसा नहीं है। उनकी मान्यता ऐसी है कि यहाँ से मरा यानी मर गया, लेकिन वास्तव में वापस ही आता है। पर उन्हें समझ आता नहीं है। पुनर्जन्म ही समझते नहीं हैं। आपको पुनर्जन्म समझ में आता है न?

 

शरीर की मृत्यु हो, तो वह जड़ हो जाता है। उस पर से साबित होता है कि उसमें जीव था, वह निकलकर दूसरी जगह गया। ़फॉरेनवाले तो कहते हैं कि यह वही जीव था और वही जीव मर गया। हम वह कबूल करते नहीं हैं। हम लोग पुनर्जन्म में मानते हैं। हम 'डेवलप' (विकसित) हुए हैं। हम वीतराग विज्ञान को जानते हैं। वीतराग विज्ञान कहता है, पुनर्जन्म के आधार पर हम इकट्ठे हुए हैं, ऐसा हिन्दुस्तान में समझते हैं। उसके आधार पर हम आत्मा को मानने लगे है। नहीं तो यदि पुनर्जन्म का आधार नहीं होता तो आत्मा माना ही कैसे जा सकता है?

 

तो पुनर्जन्म किस का होता है? तब कहे, आत्मा है, तो पुनर्जन्म होता है, क्योंकि देह तो मर गया, जलाया गया, ऐसा हम देखते हैं।

 

अतः आत्मा का समझ में आता हो, तो हल आ जाए न! लेकिन वह समझ आए ऐसा नहीं है न! इसलिए तमाम शास्त्रों ने कहा कि 'आत्मा जानो!' अब उसे जाने बिना जो कुछ किया जाता है, वह सब उसे फायदेमंद नहीं है, हैल्पिंग नहीं है। पहले आत्मा जानो तो सारा सोल्युशन (हल) आ जाएगा।

 

प्रश्नकर्ता : पुनर्जन्म कौन लेता है? जीव लेता है या आत्मा लेता है?

 

दादाश्री : नहीं, किसी को लेना नहीं पड़ता, हो जाता है। यह संसार 'इट हेपन्स' (अपने आप चल रहा) ही है!

 

प्रश्नकर्ता : हाँ, मगर वह किस से हो जाता है? जीव से हो जाता है या आत्मा से?

 

दादाश्री : नहीं, आत्मा को कुछ लेना-देना ही नहीं है, सब जीव से ही है। जिसे भौतिक सुख चाहिए, उसे योनि में प्रवेश करने का 'राइट' (अधिकार) है। जिसे भौतिक सुख नहीं चाहिए, उसे योनि में प्रवेश करने का राइट चला जाता है।

 

 शास्त्रों  में स्त्री और पुरुषों को लेकर कई न‌ियम बताए गए हैं। शास्त्र कहता है क‌ि कुछ काम ऐसे हैं जो मह‌िलाओं को नहीं करना चाह‌िए यह स‌िर्फ पुरुषों के करने योग्य काम है। इसल‌िए आज के जमाने में भी जब मह‌‌िलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम म‌िलाकर चल रही हैं लेक‌िन यह 7काम ऐसे हैं ज‌िन्हें वह नहीं करती हैं।

1. नार‌ियल फोड़ना
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

नार‌ियल के बारे में माना जाता है क‌ि यह लक्ष्मी और उर्वरा का प्रतीक है। इसल‌िए शास्‍त्रों में मह‌िलाओं के ल‌िए नार‌ियल फोड़ने की मनाही है। आपने देखा भी होगा क‌ि मंद‌िरों और दूसरे शुभ कार्यों में स‌िर्फ पुरुष ही नार‌ियल फोड़ते हैं मह‌िलाएं नहीं।

2. जनेऊ धारण करना
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

मह‌िलाएं जनेऊ बना सकती हैं लेक‌िन जनेऊ धारण का व‌िधान स‌िर्फ पुरुषों के ल‌िए है। मह‌िलाओं का यज्ञोपव‌ित नहीं होता है।और इसी कारण स्त्री के हिस्से का जनेउ पुरूष को पहनना पड़ता है और जनेउ पहनने वाले शादी के बाद दो जनेउ पहनते हैं।इसी कारण कुंवारी लड़की को  वेदाध्ययन और यज्ञ करने की अनुमति नही है सिर्फ विवाहित महिलाएं ही ये दोनों काम कर सकती हैं।

3. बलि देना
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

देवताओं के ल‌िए बल‌ि प्रदान का कार्य हमेशा पुरुष करते हैं। मह‌िलाओं के ल‌िए इस कार्य की मनाही है।

4. ओम मंत्र का जप
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

शास्‍त्रों के अनुसार मह‌िलाओं को ओम मंत्र का जप नहीं करना चाह‌िए। माना जाता है क‌ि ओम मंत्र के जप से नाभ‌ि क्षेत्र पर दबाव पड़ता है जो मह‌िलाओं के ल‌िए अच्छा नहीं माना जाता है। इसल‌िए मह‌िलाओं को मंत्र जप के समय ओम मंत्र को छोड़कर सीधे मंत्र का जप करना चाह‌िए जैसे ओम नमः श‌िवाय की जगह नमः श‌िवाय।

5. हनुमान जी की पूजा
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

हनुमान जी को ब्रह्मचारी माना जाता है इसल‌िए हनुमान जी की पूजा तो मह‌िलाएं कर सकती हैं लेक‌िन मह‌िलाओं के ल‌िए हनुमान जी का स्पर्श करने की शास्‍त्रों में मनाही है।

6. गायत्री मंत्र का जप
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

गायत्री मंत्र को शाप‌ित मंत्र माना जाता है। इसल‌िए शास्‍त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र का जप भी मह‌िलाओं के ल‌‌िए वर्ज‌ित है और ऐसा करने वाली महिला पर विपरीत प्रभाव हो सकता है या इस मंत्र का कोई लाभ नहीं होगा। 

7. साबूत कुम्हरा और सीताफल  काटना
Women Can Not Do This 7 Thing According Shastra

ऐसी भी मान्यता है क‌ि साबूत कुम्हरा और सीताफल मह‌िलाओं को नहीं काटना चाह‌िए। इसे पहले पुरूष काटते हैं या फोड़ते हैं तब म‌ह‌िलाएं इसे काट सकती हैं।

१- विना स्त्री कोई भी गृहस्थ जीवन का ब्रम्हचारी या अन्य अविवाहित पुरुष जो बाल्यावस्था से ज्यादा उम्र का हो तीर्थाटन नहीं कर सकता यानी उसे तीर्थाटन का फल नही मिलेगा अर्थात वो किसी देव मंदिर का दर्शन नहीं कर सकता (धार्मिक कार्यों में शामिल हो सकता है और बजरंगबली का दर्शन कर सकता है )।

२-विना स्त्री के कोई भी पुरुष कोई यज्ञ नहीं कर सकता (ब्राम्हण, सन्यासी को छोडकर और किसी स्त्री के बिना कोई पुरुष ब्राम्हण नहीं बन सकता इसीलिए व्रतबंध के समय मां या मां के समान स्त्री सर पर आंचल रखकर आशिर्वाद देती है। ) ।

३- कभी कोई गृहस्थ जीवन जीने वाला पुरूष विना स्त्री मुक्ती प्राप्त नही कर सकता।

 

 

केशव
आक्रोशित मन
 
  Monday July 30, 2012  
 
 
 

 

 

नागर जी अपने लेख में कहा कि अनब्याही लड़कियों को भी सेक्स करना चाहिए  तथा उन्हें भी अपनी 'प्यास' बुझा लेने का अधिकार होना चाहिए| पेश है उन्हीं के लेख पर मेरा नजरिया...

 

ऋषि मुनियों ने भी सेक्स को कभी बुरा नहीं कहा, बल्कि हिन्दू धर्म में तो कामसूत्र, योनी शास्त्र जैसे शास्त्र भी लिखे गए हैं। पर इन सबके वावजूद सेक्स करने के कुछ  नियम तय किये गए हैं। उनमें से एक सबसे बड़ा नियम है, विवाह,  यानि शास्त्रों के अनुसार स्त्री पुरुष केवल विवाह उपरांत ही सेक्स कर सकते हैं| बिना विवाह के सेक्स करना पाप कहा गया है, ऐसा केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं अपितु  दुनिया के सभी प्रमुख धर्मो में कहा गया है।  देखें :-

 

बाइबिल में 
1- ' ये अच्छा है की कोई अविवाहित रहे या विदुर रहे जैसा की मैं , पर यदि कोई अपनी काम इन्द्रीओं पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो वो विवाह कर ले - Corinthians 7:8-9
2- यदि कोई अनैतिक सम्बन्ध बना के इश्वर के नियमों को तोड़ता है तो निश्चय ही ईश्वर उसे सजा देगा - Thessalonians 4:2-8
3- ईश्वर ने यौन क्रियाओं के लिए पति पत्नी बनाये है ताकि नैतिक और अनैतिक संबंधो में फर्क कर सके -Hebrews 13:4 The Message    

आप बाइबिल से और भी उदहारण देख सकते हैं 
 Corinthians 6:9-11
1 Corinthians 6:18
1 Corinthians 7:2

कुरान में 
मोमिनान- २३:१-५ , इसरा - १७:३२, फुरकान - २५:२८ , नूर - २४:३ आदि  में भी केवल अपनी पत्नी से ही सेक्स करने की इजाजत है ( कुछ जगह रखैलो का भी जिक्र है पर वहाँ दूसरी स्थिति है ) (Allah says:Do not go near adultery, .surely it is an indecency, and an evil way [of fulfilling sexual urge].(17:32) Fornication and adultery have severely been condemned in the saying of the Prophet and the Imams. In Islam, pre-marital sex is considered an immoral act against the rights of Allah and one's own sexual organs)

कुल मिला के इस्लाम निकाह से पहले शारीरिक सम्बन्ध बनाने को हराम कहता है |

 

वेदों में 
अधर्व   वेद (१४:२:६४) के अनुसार स्त्री पुरुष के केवल विवाह उपरांत ही  यौन क्रियाये करनी चाहिए तभी इश्वर प्रसन्न  रहता है| और ऋगवेद (८.३१.५-८) में भी विवाह उपरांत ही सेक्स करने को कहा गया है | हिन्दू धर्म में १६ प्रकार के विवाह "स्वीकार्य" और  "अस्वीकार्य "  जिसमें से गन्धर्व विवाह ऐसा विवाह है जो बिना माँबाप की आज्ञा से हो सकता है और इसके बाद प्रेमी प्रेमिका सेक्स कर सकते हैं। शकुन्तला और दुष्यंत ने गन्धर्व विवाह कर के सेक्स किया था जिसके बाद भरत पैदा हुए जिसके नाम पर अपने देश का नाम "भारत" पड़ा , यानि विवाह के बाद ही सेक्स |

कहने का तात्पर्य ये है की विवाह के बाद ही सेक्स किये गए सेक्स को ही नैतिक सेक्स कहेंगे |

आगे नागर साहब कहते हैं कि अगर अनब्याही लड़की किसी मनपसंद साथी के साथ सोये, शारीरिक सुख हासिल करे तो उसे आवारा-बदचलन क्यों कहे?  हमारी आपकी  मामी, चाची, मौसी आदि भी तो करती हैं फिर उसे करने में बुराई क्या? चाची ,मौसी, मामी , दीदी करे तो सम्मानित और अनब्याही करे तो अनैतिक कैसे हो सकता है? तो ,सही कहा आपने नागर साहब , कोई बुराई नहीं... मैं तो कहता हूँ कि सड़कों पर खुले आम सेक्स होना चाहिए, बसों में, ट्रेनों में, अस्पतालों, ऑफिस, स्कूल, कालेज में, हर जगह सेक्स करने की अनुमति होनी चाहिए। आखिर बंद कमरे में सेक्स सम्मानित क्यों और खुले आम करने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? 

आखिर सब को पता है की सेक्स क्या है फिर एकांत में क्यों? है ना नागर साहब???? सब खुले आम होना चाहिए... माँ, बाप, दादा, दादी, अध्यापक, बॉस, पुलिस, जज... सब के सामने...

 चलिए ये तो हो गयी नागर साहब की बात... अब मेरी बात, अगर शास्त्रों को थोड़ी देर के लिए भूल जाये तो आप  देखेंगे की बिना शादी के सेक्स करने के कारण लड़की  के जीवन में बहुत सी हानियाँ हो सकती हैं| जैसे :-

१- गर्भवती  होने का खतरा 
अगर सेक्स करने के बाद लड़की गर्भवती हो जाती है तो उस बच्चे का लालन -पालन किसके जिम्मे होगा? देश में गर्भपात का सबसे बड़ा कारण ऐसा सेक्स ही है क्योंकि अधिकतर प्रेमी जोड़े इस हालत में नहीं होते कि वो पैदा होने वाले बच्चे की जिम्मेदारी उठा सके, यानि जच्चा -बच्चा दोनों की जान का खतरा|

२- कुंठा का शिकार होना 
अगर किसी कारणवश सेक्स करने के बाद भी  किसी  लड़की की शादी उसके प्रेमी के साथ  नहीं होती तो जिन्दगी भर कुंठा का शिकार, प्रेमी द्वारा  ब्लैक-मेलिंग का डर|

३- एक बार सम्भोग करने के बाद मन पर नियंत्रण रखना कठिन हो जाता है इसलिए शादी के बाद पतिव्रता  होने की सम्भावना कम हो जाती है, जिससे परिवार नष्ट होने का खतरा रहता है।

 

और भी कई खतरे हैं जिनको आप सब भी जानते ही होंगे ....

 

मैंने एक प्रश्न पूछा था नागर साहब से कि" अगर हम बाज़ार से कोई फल लेने जाते हैं तो कौन सा फल खरीदेंगे? दाग वाला या ताज़ा?" उन्होंने मेरे प्रश्न का जबाब नहीं दिया... शायद  फालतू सवाल समझा होगा :))  पर मैं फालतू सवाल कभी नहीं पूछता... कुछ ना कुछ रहस्य अवश्य होता है... बस समझने वाले की फेर है |

 

वो सवाल इसलिए था कि हम सब ताज़े फल ही लेना पसंद करेंगे... क्योंकि हम जानते हैं कि ताज़े फल सेहत के लिए अच्छे होते हैं और उन ताज़े फलों को खाके हमरे मन को खुशी मिलती है।ठीक उसी प्रकार जब जब शादी होती है तो पती -पत्नी दोनों ही चाहते हैं की उनका जीवन साथी पूर्णतः कुंवारा या कुंवारी हो। एक दम ताज़ा हो, बेदाग हो , उसपर पहले से किसी और का हक ना हो। सुहाग सेज पर पहली बार अपने जीवन साथी से साथ अन्तरंग होने का अहसास नैसर्गिक होता है, क्योंकि उस के बाद जीवन की हर मुसीबत का मिल के सामना करने की भावना प्रबल होती है। आप ने  देखा होगा कि यदि किसी ने शादी से पहले सेक्स ना किया हो तो वो शादी को लेके ज्यादा खुश और उत्तेजित रहते हैं, शादी के बाद ऐसे लोग अपने जीवन साथी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं, परिवार के बारे में ज्यादा समर्पित रहता/ रहती है |

 

मित्रो, इस लेख पर विचार पूर्णतः मेरे हैं, आप इससे सहमत हों या ना ये आप पर निर्भर है|  

वेदाध्ययन और उपनयन

 

  • वेदाध्ययन करने के लिए उपनयन अनिवार्य है । उपनयन किसका वेदसम्मत है?

    –यह निर्णीत होते ही वेदाध्ययन के अधिकारी का भी निर्णय हो जायेगा ।

वेदाध्ययनविधायक वाक्य है –”स्वाध्यायोऽध्येतव्यः“–तैत्तिरीय आरण्यक –2/15,
स्वाध्याय –स्वश्चासौ अध्यायः , स्वस्य अध्यायः–इस प्रकार कर्मधारय या षष्ठी

तत्पुरुष करके स्वाध्याय का अर्थ हुआ –वेद,अध्येतव्यः –पढ़ना चाहिए ।


लिड़्,लेट् ,लोट्, तव्यत् आदि विधान के लिए हैं । प्रकृत वाक्य से वेदाध्ययन का
विधान किया गया है ।ध्यातव्य है कि स्वशाखा वेद ही है ।

  • यह अध्ययन किस किस को कैसी योग्यता उपलब्ध होने पर करना चाहिए?

upanayan-sanskar_thumb–इस शंका को निर्मूल करने के लिए शतपथ ब्राह्मण का वचन है–
” अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत “, ” तमध्यापयेत् “,एकादशवर्षं राजन्यं, द्वादशवर्षं वैश्यम् ,

— आठ वर्ष के ब्राह्मण का उपनयन करे ,और उसे पढ़ाये ।

इसी प्रकार 11वर्ष के क्षत्रिय और 12वर्ष के वैश्य का उपनयन करके उन्हें पढ़ाये ।


किसका उपनयन कब हो ? –इसे भी बताया गया है –
मीमांसा के प्रौढविद्वान् शास्त्रदीपिकाकार ” पार्थसारथि मिश्र ” सप्रमाण लिखते हैं–

”वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वैश्यम् ” इति द्वितीयानिर्देशादुपनयनसंस्कृतास्त्रैवर्णिकाः

–अध्याय १,पाद१,अधिकरण १,सूत्र १
वसन्त काल में ब्राह्मण का उपनयन करे ,ग्रीष्म में क्षत्रिय और शरद् ऋतु में वैश्य का ।…………..

  • भगवान् वेद के इन वचनों में सर्वत्र “ब्राह्मणम्,राजन्यं , वैश्यम् ” इस प्रकार द्वितीयान्त पुल्लिंग का ही प्रयोग हुआ है ,स्त्रीलिंग का नही । अतः उपनयन पुरुषों का ही होगा ,स्त्रियों का नहीं –यही भगवती श्रुति का डिमडिम घोष है । यह बात सामान्य व्याकरण– अध्येता को भी ज्ञात है कि पुंस्त्व की विवक्षा में पुल्लिंग और स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर टाप् ,ड़ीप् आदि प्रत्यय होकर टाबन्त ड़ीबन्त अजा,ब्राह्मणी,क्षत्रिया,वैश्या आदि शब्दों का प्रयोग होता है । जब घोड़ा मगाना होगा तब ” अश्वमानय ” ही बोला जायेगा । और घोड़ी

    मगाना होगा तो ” अश्वामानय ” ही बोलेंगे ।

 

  • इन तथ्यों को ध्यान में रखकर देखें कि उपनयन श्रौतवचनों से किसका कहा जा रहा है ? पुरुष का या स्त्री का ? ” पशुना यजेत ” इत्यादि स्थलों में पुंस्त्व आदि की विवक्षा है ;क्योंकि महर्षि पाणिनि जैसे सूत्रकार ने ” तस्माच्छसो नः पुंसि , स्त्रियाम् , अजाद्यतस्टाप्, स्वमोर्नपुंसकात् ,–जैसे सूत्रों द्वारा पुल्लिंग में अकारान्त शब्दों से परे शस् के स् को न् ,स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप् आदि तथा नपुसक लिंग में अदन्तभिन्न शब्दों से परे सु और अम् विभक्ति का लोप कहा है ।

 

अतः इन तथ्यों को मानकर ही अर्थ करना चाहिए ।
” तथा लिंगम् ” –पूर्वमीमांसा–4/1/8/16,सूत्र से महर्षि जैमिनि ने 5000 वर्ष पूर्व ही इस तथ्य की पुष्टि कर दी थी । महर्षि पाणिनि के पहले भी शाकटायन, आदि अनेक वैयाकरण हो चुके हैं । वेदों की आनुपूर्वी में प्रवाहनित्यता मानें या और कुछ, उसमें परिवर्तन ईश्वर भी
नही करता ।…………….


तात्पर्य यह कि समयानुसार वेद नही बदलते हैं ढुलमिल नेताओं की तरह ।
वेद से भिन्न जो स्मृतियां हैं उनका प्रामाण्य वेदमलकत्वेन ही है ,वेदविरुद्ध होने पर वे अप्रमाण की कोटि में चली जाती हैं –ये दोनो सिद्धान्त क्रमशः ” स्मृत्यधिकरण “– 1/3/1/2, ” विरोधाधिकरण “–1/3/1/3-4, पूर्वमीमांसा से सर्वमान्य हैं ।


” विरोधे त्वनपेक्ष्यं स्यादसति ह्यनुमानम् ” –1/3/1/3, सूत्र तो इस विषय में अति प्रसिद्ध है ।
अतः अपौरुषेय वेद–वसन्ते ब्राह्मणमपनयीत,ग्रीष्मे राजन्यं , शरदि वैश्यम् “ से विरुद्ध ” पुराकल्पे कुमारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते ” स्मृति सर्वथा अप्रामाणिक है ।


इससे वेदप्रतिपादित सिद्धान्त को सञ्कुचित नही किया जा सकता । अतः स्त्रियों का उपनयन किसी भी कल्प में नही होता है । और सभी कल्पों में पुंस्त्वविशिष्टों का ही उपनयन वैदिक सिद्धात है । इससे यह भी सिद्ध होता है कि जब उनका उपनयन ही नही तब वेदाधिकार न होने से वेदमन्त्रसाध्य यज्ञादि कर्मों के आचार्यत्व का वे निर्वहन भी नही कर सकतीं । हां पति के साथ वे प्रत्येक कार्य का सम्पादन करेंगी । पत्नी के विना पति किसी यज्ञादि कर्म का अनुष्ठान नही कर सकता ;क्योंकि आज्यावेक्षण जैसे कर्म यदि नही हुए तो अंगवैकल्य से कर्म फलप्रद नही हो सकता ।


–यह तथ्य पूर्वमीमांसा में –6/1/4/8से 20वें सूत्र तक विस्तार से वर्णित है ।

  • ऋषिकाएं –अपाला आदि अनेक ऋषिकाएं हैं जिन्हे वेदमन्त्रों का साक्षात्कार हुआ है –यह वेद से ही सिद्ध है । अतः इनका वेदाध्ययन में अधिकार था या नही ?


समाधान – अपाला आदि ऋषिकाओं का वेदमन्त्रद्रष्टृत्व जैसे वेदबोध्य है वैसे ही स्त्रियों के लिए वेदाध्ययन के अंग उपनयन का अभाव भी वेदबोध्य ही है । यह तथ्य पूर्व में निर्णीत हो चुका है । अतः अपाला जैसी महनीय नारियों के भी वेदाध्ययन की कल्पना वेदविरुद्ध है । रही मन्त्रसाक्षात्कार की बात, तो वह प्रकृष्ट तपःशक्ति से ही सम्भव है । जब 5 वर्ष के तपःसंलग्न ध्रुव में भगवत्कृपा से सरस्वती प्रकट हो सकती हैं तो अपाला जैसी नारियों में क्यों नहीं ?……………..

  • तप अनेक प्रकार के होते हैं जिनमे स्त्रियों का अधिकार है तभी तो भगवान् श्रीराम ने शबरी जी से पूंछा था कि आपका तप बढ़ रहा है न?

    –क्वचित्ते वर्धते तपः –वाल्मीकि रामायण -अरण्यकाण्ड-74/8,

    आज भी कर्मकाणड में देवताओं को यज्ञोपवीत चढ़ाया जाता है देवियों– गौरी आदि को नहीं –इसका मूल नारियों के उपनयन का अभाव ही है । भगवती सरस्वती विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं । उनकी कृपा से मूढ भी चारों वेदों का ज्ञाता हो सकता है । किन्तु इससे सरस्वती जी के वेदाध्ययन और उपनयन की कल्पना तो नही की जा सकती । समस्त वेदों तथा अनेक व्याकरणों के महापण्डित ज्ञानियों में अग्रगण्य रुद्रावतार वानराकारविग्रह पुरारी की भी जो वन्दनीयां हैं। जो श्री की भी श्री हैं । जिनके कृपाकटाक्ष से अनन्तानन्त वेद महामूढ को भी क्षण मात्र में प्राप्त हो सकते हैं ।


मारीच जैसा राक्षस भी रावण से बात करते हुए जिनके पति श्रीराम को विग्रहवान् धर्म कहता है । धर्मशिक्षणहेतु अवतरित उन भगवान् श्रीराम से अभिन्न उनकी प्रियतमा पराम्बा जानकी जी के लिए हम वेदविरुद्ध उपनयन और वेदाध्ययन की कल्पना नहीं कर सकते ।


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शरीरे मुखस्य प्राधान्यं , तद्विना प्रवचनं ,देहपोषकतत्त्वानामुदरे गमनं चासंभवमतो प्राधानान्गमुखादुत्पन्नस्य ब्राह्मणस्य प्राधान्यं , जातिस्तु जन्मनैव घटपटादौ सर्वैरनुभूयते , नतु कर्मणा , अतिव्याप्तेः , श्राद्धादि शुभे कर्मणि ब्राह्मणत्वजातिविशिष्टसंध्यादि कर्मयुतो विप्रस्य ग्रहणं शास्त्रसिद्धतया पूज्यत्वं , वैशिष्ट्यं च सामानाधिकरण्यसंबन्धेन बोध्यम्|
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चाण्डालोस्तु स द्विजोस्तु” इति कथमुक्तम् आचार्येण मनीषा पञ्चके ? नैष दोषः। अत्र पारमार्थिक दृष्ट्या उक्तम् स द्विजोस्तु इति । गुणातीतस्य पुरुषस्य वर्णनम् अत्र वर्तते। द्विजशब्दस्य अत्र यौगिकार्थँ अपेक्षितम्।तथाहि द्वितीयो जन्मानः पुरुषः एव द्विजः । न संस्कारापेक्षया। कथं ? ब्रह्मैवाहमिति स्थितप्रज्ञस्य लक्षणात्। भाष्यविरोधात् श्रुतिविरोधाच्च । श्रुतिस्मृतिविरोधमत्र द्रष्टव्यम् , तथाहि- तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्ब्राह्मणयोनिँ वा क्षत्रिययोनिँ वा वैश्ययोनिं…चाण्डालयोनिँ वा । शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः (तै॰सं॰7/1/1/6), ब्राह्मणस्य मुखमासीद्…पद्भ्यां शूद्रोऽजायत्। (यजु॰पुरुष सूक्त), आचार्येणाऽपयुक्तम् ‘स्त्रीशूद्रौनाऽधीयताम् इति श्रुतिः’ स्वीय भाष्ये । तथैव सर्ववर्णानां स्वधर्मानुष्ठाने परमपरिमितं सुखं ततः परिवृत्तौ कर्मशेषेण जातिँ रुपं वर्णँ बलं वृत्तं मेधां प्रज्ञां द्रव्याणि धर्मानुष्ठानमिति प्रतिपद्यन्ते ।[-आपस्तम्बः] प्रभृत गौतमव्यासमन्वादिपर्यन्तं नानाभिः ऋषयःमुनयः स्मृत्यादयः वचनानि चातुर्वर्ण्ये जात्यविरोधे प्रमाणाः सन्ति।। येषामपलापः उपेक्षणीयः।।
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शंकर भाष्य [१८.४२] में शंकराचार्य स्पष्ट कहते है—“ब्रह्म कर्म ब्राह्मण जाते: कर्म ” ,,,,,,, ये सब ब्राह्मण जाति के कर्म है | ” 
इसी प्रकार [१८.४३,,१८.४४] में तो जगद्गुरु स्पष्ट कहते है की ये ” एतेषां जतिविहितानाम कर्मणाम “” अर्थात ये सब जाति के कर्म वर्णन किये है |
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तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वा ।
अथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ५,१०.७ ॥
तत्तत्र तेष्वनुशयिनां य इह लोके रमणीयं शोभनं चरणं शीलं येषां ते रमणीयचरणाः रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा उच्यन्ते ।
क्रौर्यानृतमायावर्जितानां हि शक्य उपलक्षयितुं शुभानुशयसद्भावः ।
तेनानुशयेन पुण्येन कर्मणा चन्द्रमण्डले भुक्तशेषेणाभ्याशो ह क्षिप्रमेव ।
यदिति क्रियाविशेषणं ते रमणीयां क्रौर्यादिवर्जितां योनिमापद्येरन्प्राप्नुयुर्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्त्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वा स्वकर्मानुरूपेण ।
अथ पुनर्ये तद्विपरीताः कपूयचरणोपलक्षितकर्माणोऽशुभानुशया अभ्याशो ह यत्ते कपूयां यथाकर्म योनिमापद्येरन्कपूयामेव धर्मसम्बन्धवर्जितां जुगुप्सितां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा स्वकर्मानुरूपेणैव ।
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जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंसत्वं ततो विप्रता ।। -विवेक चूडामणि [आचार्य शङ्कर]।। अथास्य वेदमुपश्रृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोतपरिपूरणं वेदोच्चारणे जिह्वाच्छेदः धारणे शरीरभेद इति । [ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य 1/3/38] अपशूद्राधिकरणम्।। शमो दमस्तपः॰इति गीतायाम्[18/42] अपि भगवता भगवत्पादेन स्वीय भाष्ये शमादयः ब्रह्मकर्म “ब्राह्मणजातेः” कर्म स्वभावजम् इत्युक्तम्। तत्रैव पूर्वेऽपि श्लोके[ब्राह्मणक्षत्रियविशां॰18/41] आचार्येण उक्तम्- ” ब्राह्मणाः च क्षत्रियाः च विशः च ब्राह्मणक्षत्रियविशः तेषां शूद्राणां असमासकरणम् “एकजातित्वे” सति वेदे अनधिकारात् इतरेतरविभागेन व्यवस्थापितानी ।” अथापि पूर्वपक्षं स्थापयन्ति- ननु शास्त्रप्रविभक्तानि शास्त्रेण विहितानि ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि कथं उच्यते सत्त्वादिगुणप्रविभक्तानि इति । अनन्तरं तस्य शंकां निवारयन्ति, तथाहि- न एष दोषः , शास्त्रेण अपि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षया एव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि न गुणानपेक्षया एव इति शास्त्रप्रविभक्तानि अपि कर्माणि-प्रविभक्तानि इति उच्यन्ते। -गीता शाङ्करभाष्यः।। तत्रैव उपोद्घाते अपि आचार्येण उक्तम्- स आदिकर्त्ता नारायणो विष्णुः भौमस्य ब्रह्मणो ब्राह्मणत्वस्य रक्षणार्थँ देवक्यां वसुदेवाद् अंशेन कृष्णः किल सम्बभूव । किँच ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षेन रक्षितः स्याद् वैदिको धर्मः तदधीनत्वाद् “वर्णाश्रमभेदानाम्”।। -आचार्य शङ्करः ।
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ब्राह्मोsजातौ–६/४/७१, अनेन सूत्रेण अपत्येsनपत्ये अर्थे ब्राह्म शब्दो 

निपात्यते , टिलोपो भवतीति तात्पर्यम् |

परम् जातिवाचके अपत्यार्थे तु ब्रह्मणोsपत्यं व्युत्पत्तौ ब्राह्मण शब्दः

सिध्यति , अत्र “न मपूर्वोsपत्ये—“ इत्यनेन प्राप्तः टिलोपः अनेन निषिद्ध्यते | 

ततो ब्राह्मणः सिद्ध्यति |
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दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः। उत्साद्यन्ते “जातिधर्माः” कुलधर्माश्च शाश्वताः ।। -गी॰1/43 “सहजं” कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः गी॰18/48 अत्र सहजं=सह जन्मना इति शाङ्करभाष्यः ।। चातुर्वर्ण्यँ मया “सृष्टं” गुणकर्मविभागशः। 
-गी॰4/13 आदि -आदि तथाहि-“सर्वोपनिषदो” गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धंगीतामृतं महत्।।
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ब्राह्मोsजातौ–६/४/७१, अनेन सूत्रेण अपत्येsनपत्ये अर्थे ब्राह्म शब्दो 

निपात्यते , टिलोपो भवतीति तात्पर्यम् |

परम् जातिवाचके अपत्यार्थे तु ब्रह्मणोsपत्यं व्युत्पत्तौ ब्राह्मण शब्दः

सिध्यति , अत्र “न मपूर्वोsपत्ये—“ इत्यनेन प्राप्तः टिलोपः अनेन निषिद्ध्यते | 

ततो ब्राह्मणः सिद्ध्यति |

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  • वर्ण और जाति के तात्पर्य मेँ अन्तर मानने वाले धूर्तोँ के मुख पर शास्त्र का जोरदार तमाचा — 

    “ब्राह्मणाःक्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः । चतुर्थँ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ।।” -मनु॰10/4 

गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम्। गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विश:॥36॥ ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्य्यं विप्रस्य पंचमे॥37॥

‘गर्भ से आठवें वर्ष में ब्राह्मण का, ग्यारहवें में क्षत्रिय का और बारहवें में वैश्य का उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार करे। परंतु यदि व्यास, वसिष्ठादि की तरह ब्रह्मतेजोयुक्‍त होने की इच्छा हो तो ब्राह्मण का पाँच ही वर्ष में कर डाले’
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भले ही ब्राह्मणों में कई भेद हो . जैसे ………..

देवो मुनिर्द्विजो राजा वैश्यः शुद्रो निषादकः I

पशुमलेच्छेअपि चांडालो विप्रः दस्विधाह स्मृताः I I

अर्थात ,देव,मुनि,द्विज,राजा( क्षत्रिय ) ,वैश्य शुद्र, निषाद ,पशु ,म्लेक्छ ,और चंडाल ,ये दस प्रकार के ब्रह्मण होते है I……..

१.देव ब्रह्मण===स्नान संध्या, जप, होम, देवपूजन ,अतिथि शेवा आदि नित्य कर्म करने वाला ब्रह्मण देव ब्रह्मण कहलाता है I

२.मुनि ब्रह्मण ==कंदमूल खाने वाला, वनवासी, पित्रिश्रध्पारायण ब्रह्मण, मुनि ब्रह्मण कहलाता हैI 

३.द्विज ब्रह्मण===वेदांत का अनुशीलन करने वाला, शक्तिरहित, सांख्य योग ब्रह्मण द्विज कहलाता है I 

४.क्षत्रिय ब्रह्मण ==संग्राम में सबके सामने शत्रु को अस्त्र से रोकने वाला ,संग्राम विजयी ,धनुर्धर ब्रह्मण, क्षत्रिय ब्रह्मण कहलाता है I

५.वैश्य ब्रह्मण ==कृषि ,वाणिज्य ,और गोरक्षा करने वाला ब्रह्मण विषय ब्रह्मण कहलाता है I 

६.शूद्र ब्रह्मण ===लाख ,नमक , दुध ,घी ,मधु (मदिरा )और मांस विक्रेता ब्रह्मण शूद्र ब्रह्मण कहलाता है I 

७.निषाद ब्रह्मण ==चोरी डकैती करने वाल ईर्ष्यालु ,परपीड़क,मछली मांस का लोभी निषाद ब्रह्मण कहलाता हैI 

८.पशु ब्रह्मण ===ब्रह्मण तत्व को कुछ न जनता हो ,फिर भी जनेऊ के गर्व में चूर रहता हो, वो पशु ब्रह्मण कहलाता हैI 

९.मलेक्ष ब्रह्मण ===जो ब्रह्मण कूवा तालाब आदि जलाशयों से पानी भरने या स्नान करने में अवरोध उत्पन्न करता हो वो मलेक्ष ब्राह्मन कहलाता है I 

१०.चांडाल ब्राह्मन ===ब्राह्मण क्रिया से हीन, महामूर्ख ,कठोर ,निर्दय ब्राह्मन चांडाल ब्राह्मन कहलाता है I

  • वेद सम्मत आठ प्रकार के ब्राह्मण होते है ,जो इस प्रकार है ………


मात्रश्चब्रह्मंस्चैव श्रोतियाश्च ततः परम I अनुचान्स्ताथा भ्रूणों ऋषिकल्प ऋषिर्मुनिः II 

१.मात्र ब्राह्मण
२.ब्राह्मन ब्राह्मण, 
३.श्रोत्रिय ब्राह्मण 
४.अनुचान ब्राह्मण 
५.भ्रूण ब्राह्मण
६.ऋषिकल्प ब्राह्मण 
७.ऋषि ब्राह्मण 
८.मुनि ब्राह्मण ………………….. 

  • भले ही कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा ज्ञानी हो ,किसी भी विषय का कितना भी बड़ा ज्ञाता हो ,वो उस विषय का मास्टर हो सकता हैI,भले ही उस विषय में उसे पांडित्व हासिल हो जाये ,वो उस विषय का पंडित हो सकता है ………………………… 

    पर ब्राह्मण कदापि नहीं हो सकता I उसके लिए उसे ब्राह्मणमाता के कोख से ब्राह्मण रजवीर्य से जनम लेना ही पड़ेगा I……………………. 

    गीता का ज्ञान देने वाले प्रकांड पंडित श्रीकृष्ण कभी ब्राह्मण नहीं कहे गए विदुर जी जैसे प्रकांड विद्वान ब्राह्मण नही कहलाये अशवाश्थामा द्वारा घोर घृणित कार्य पांडव के समस्त पुत्रो का वध करने की बाद भी ब्राह्मन होने के नाते द्रौपदी द्वारा माफ़ किया गया I………….

    गुणकर्म से अगर जाति बनती तो जीवन पर्यंत अस्त्र शस्त्र का प्रयोग करने वाले परशुराम और द्रोणाचार्य क्षत्रिय नहीं बन सके I……….. …………………….. 

    आज के परिवेश में बात करे तो ……….. 

    ब्राह्मण का पुत्र चाहे,उसके पास रहने को घर न हो ,पहनने को कपडे न हो , खाने को अन्न न हो ,उसे दलित का दर्ज़ा नहीं मिलेगा ,उसकी जाति ब्राह्मण ही रहेगी ,उसे नौकरी में आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा ,चाहे वो खाए बिना मर जाये I वही कोई भी ,जो आरक्षण का पात्र हो हो ,कितना भी बड़ा ज्ञानी हो ,उसके पास बंगला ,गाड़ी,कहने का मतलब सब कुछ हो , फिर भी उसकी जाति वही रहेगी क्यों की वो उस जाति से मतलब रखता है ,उसे ही आरक्षण का लाभ मिलेगा ……….

    ( इसे अन्यथा न लिया जाय,सिर्फ एक उदाहरण के रूप में ले ) व्यक्ति, चाहे किसी भी जाति का हो, अपने जाति ,अपने माता – पिता और अपने पूर्वजो पर गर्व करना चाहिए 

    धन्यवाद………………….

  • अभेद्य वेदानुकूल तर्कोँ के डिँडिम घोष और शास्त्रोँ के जोरदार तमाचोँ से भी जिनकी प्रगाढ निद्रा भंग न होवे , ऐसे कुम्भकर्ण का रिकाँर्ड तोडने वाली सुषुप्त मानसिक स्थिति रखने वालोँ का कुछ नहीँ हो सकता ! ब्रह्माऽपि न तान् रञ्जयितुं शक्यते । 

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brahmin

जाति का विरोध करने वाले 96% वे लोग होते हैँ जिनकी खुद हीन जाति होती है ! इन महामूर्खचक्रचूडामणियोँ को कभी ये खयाल नहीँ आता कि वैदिक व्यवस्थाएँ भगवान की इच्छा से बनी हैँ ! और अपने अपने शास्त्रविहित कर्मोँ से उसी की अर्चना करनी है ! इसमेँ किसी का निजी मन्तव्य या हठ क्या कर लेगा ?

 

उपनयन संस्कार
इस संस्कार में आचार्य शिष्य से कहता है कि -'तू ईश्वर का ब्रह्मचारी है। वस्तुतः ईश्वर ही तेरा आचार्य है। मैं तो उसकी ओर से तेरा आचार्य हूँ।' इस का यह अर्थ है कि आचार्य कहता है कि ईश्वर कृपा से जो ज्ञान मैंने प्राप्त किया है, वही मैं तुझे दूंगा। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है - बालक की शिक्षा पर उसके भावी जीवन का अच्छा या बुरा होना निर्भर था। उसके भावी जीवन पर ही समाज की उन्नति या अवनति निर्भर थी।
गृह्यसूत्रों के अनुसार ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार आठ वर्ष की क्षत्रिय का ग्यारह वर्ष की और वैश्य का बारह वर्ष की अवस्था में किया जाता था। तीव्र बुद्धि वाले ब्राह्मण का पाँच, बलवान क्षत्रिय का छः और कृषि आदि करने की इच्छा वाले वैश्य का आठ वर्ष की अवस्था में भी यह संस्कार किया जा सकता था। अधिकतम निर्धारित आयु तक जिन उच्च वर्ण के बालकों का उपनयन नहीं जाता था।
अधिकतम निर्धारण आयु तक जिन उच्च वर्ण के बालकों का उपनयन नहीं होता था, उन्हें व्रात्य कहा जाता था और शिष्ट समाज में उनको निंदनीय समझा जाता था। मनु ने ब्राह्मण बालक के लिए चौबीस वर्ष लिखी है। तीनों वणाç के बालकों की अवस्थाओं में अंतर का कारण यह प्रतीत होता है कि ब्राह्मण बालक के घर में सदा ही पढ़ने- पढ़ाने का वातावरण रहता था। क्षत्रिय के परिवार में इससे कुछ कम और वैश्य के परिवार में उससे भी कम। ब्राह्मण को वैसे भी क्षत्रिय और वैश्य की अपेक्षा अध्ययन में कम समय लगाना पड़ता था।
गृह्यसूत्रों और स्मृतियों में उपनयन संस्कार का पूरा विवरण मिलता है। इस समय बालक एक मेखला धारण करता था, जो तीनों वणाç के लिए अलग- अलग निर्धारित की गई थीं। ब्राह्मण बालक मूंज की, क्षत्रिय धनुष की डोरी की और वैश्य ऊन के धागे की कोंधनी धारण करता था। उनके डंडे भी अलग- अलग लकड़ियों के होते थे। ब्राह्मण ढाक या बेल का, क्षत्रिय बरगद का और वैश्य उदुंबर का डंडा धारण करता था। वह यज्ञोपवीत भी धारण करता था। आचार्य इसके बाद बालक से पूछता था कि क्या वह वास्तव में अध्ययन करने का इच्छुक है और ब्रह्मचर्य पालन की प्रतिज्ञा करता है। बालक के इन दोनों बातों का पूर्ण आश्वासन देने पर ही आचार्य उसे अपना शिष्य बनाता था और कहता था कि तू आज से मेरे कहने के ही अनुसार कार्य करेगा। इसके बाद आचार्य गायत्री मंत्र का अर्थ शिष्य को समझाता था।
इस संस्कार के बाद बालक "द्विज' कहलाता था, क्योंकि इस संस्कार को बालक का दूसरा जन्म समझा जाता था। इस संस्कार के बाद बालक का उत्तरदायित्व बहुत बढ़ जाता था। इसी कारण इस संस्कार का बहुत महत्व था। बालक को इस बात की अनुभूति कराई जाती थी कि वह अपने परिवार और समुदाय के प्रति अपने कर्तव्य को भली- भांति समझने के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर अभीष्ट योग्यता प्राप्त करें।
इसके बाद बालक भिक्षा माँगता था, जिससे कि उसमें अहम्यन्यता न रहे। भिक्षा में प्राप्त भोजन वह गुरु को देता था और गुरु के भोजन कर लेने के बाद उसमें से जो भोजन शेष बचता था, उसे वह स्वयं खाता था।
उपनयन संस्कार की पृष्ठभूमि :-
"उपनयन' वैदिक परंपरा की अनुयायी आर्य संस्कृति का एक महत्वपूर्ण संस्कार था। यह एक प्रकार का शुद्धिकरण ( संस्करण ) था, जिसे करने से वैदिक वर्णव्यवस्था में व्यक्ति द्विजत्व को प्राप्त होता था ( जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते ),अर्थात् वह वेदाध्ययन का अधिकारी हो जाता था। उपनयन का शाब्दिक अर्थ होता है "नैकट्य प्रदान करना', क्योंकि इसके द्वारा वेदाध्ययन का इच्छुक व्यक्ति वेद- शास्रों में पारंगत गुरु/ आचार्य की शरण में जाकर एक विशेष अनुष्ठान के माध्यम से वेदाध्ययन की दीक्षा प्राप्त करता था, अर्थात् वेदाध्ययन के इच्छुक विद्यार्थी को गुरु अपने संरक्षण में लेकर एक विशिष्ट अनुष्ठान के द्वारा उसके शारीरिक एवं जन्म- जन्मांतर दोषों/ कुसंस्कारों का परिमार्जन कर उसमें वेदाध्ययन के लिए आवश्यक गुणों का आधार करता था, उसे एतदर्थ आवश्यक नियमों ( व्रतों ) की शिक्षा प्रदान करता था, इसलिए इस संस्कार को "व्रतबन्ध' भी कहा जाता था।
फलतः अपने विद्यार्जन काल में उसे एक नियमबद्ध रुप में त्याग, तपस्या और कठिन अध्यवसाय का जीवन बिताना पड़ता था तथा श्रुतिपरंपरा से वैदिक विद्या में निष्णात होने पर समावर्तन संस्कार के उपरांत अपने भावी जीवन के लिए दिशा- निर्देश ( दीक्षा ) लेकर ही अपने घर आता था। उत्तरवर्ती कालों में यद्यपि वैदिक शिक्षा- पद्धति की परंपरा के विच्छिन्न हो जाने से यह एक परंपरा का अनुपालन मात्र रह गया है, किंतु पुरातन काल में इसका एक विशेष महत्व था।
उपनयन की अनिवार्यता :-
इस संदर्भ में यह भी उल्लेख्य है कि आप० गृ० सू० ( 1/1/1/19 ) के अनुसार संस्कार केवल उन्हीं व्यक्तियों के लिए आवश्यक था, जो कि गुरुजनों के आश्रम में जाकर उनके सान्निध्य में रहकर ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन करते हुए गुरुमुख से वैदिक विद्याओं को प्राप्त करना चाहते थे। इसमें प्रत्येक वैदिक शाखा के अध्ययन के लिए उपनयन का पृथक्- पृथक् विधान हुआ करता था। अतः उपनयन उन लोगों के लिए अनिवार्य नहीं था, जो कि गुरुओं के आश्रमों में जाकर उनके नैकट्य में रहते हुए वेदाध्ययन के इच्छुक नहीं होते थे। उपनयन के इस पक्ष का संकेत उस आख्यान से मिलता है, जिसमें कि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को यह परामर्श देते हैं कि उसे ब्रह्मचर्य ( विद्यार्थी ) का व्रत धारण करना चाहिए, क्योंकि उसके परिवार के सदस्यों ने जन्म के आधार पर ब्राह्मणत्व ( द्विजत्व ) का दावा नहीं किया है ( छांदोग्य० उप० 6.1.9 )। अतः वैदिक परंपरा में दीक्षित होने, स्वशाखीय वेदों का अध्ययन करने के लिए गुरु/ आचार्य के सान्निध्य में रहना तथा वहाँ रहते हुए अध्ययन के साथ- साथ विभिन्न व्रतों का सम्यक् रुप से पालन करना, नित्य प्रातः सायं संध्या- हवन करना, भिक्षाचरण के द्वारा अपना तथा गुरु का पोषण करना एवं वैदिक विद्याओं में पारंगत होने पर गुरु से अंतिम दीक्षा लेकर वापस आना ही, उपनयन संस्कार का प्रमुख लक्ष्य था।
ब्राह्मण ग्रंथों में प्राप्त "अंतेवासी' एवं "ब्रह्मचारी' के विवरणों से ज्ञात होता है कि वैदिक काल में "उपनयन' अर्थात् विद्याध्ययनार्थ ग

वेदों को मनुष्यकृत सिद्ध करने की साजिश का मुंहतोड़ जवाब! जानें कि क्यों वेद परमेश्वर के ही बनाए हैं! पढ़ें और प्रचार करें!

 

सभी बड़े विद्वान और शोधकर्ता वेद को मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन पुस्तक मानते हैं। वे अपने जन्म से आज तक अपने मूल रूप में बने हुए हैं। उन्हें मूल स्वरुप में बनाए रखने वाली अनूठी विधियों को जानने के लिए पढ़ें – ‘वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?’ कई विद्वान इसे सृष्टि के महानतम आश्चर्यों में गिनते हैं।

 

जाकिर नाइक के गुरु और जाने पहचाने इस्लामिक विद्वान अब्दुल्ला तारिक भी वेदों को प्रथम ईश्वरीय किताब मानते हैं। जाकिर नाइक ने अपने वहाबी फाउंडेशन के चलते भले ही इस बात को खुले तौर पर स्वीकार न किया हो, पर इसका खंडन भी कभी नहीं किया। वेदों में मुहम्मद की भविष्यवाणी दिखाने की उनकी साजिश से इस बात की पुष्टि होती है कि वह वेदों को अधिकारिक रूप से प्रथम ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं। वैसे उनकी यह कोशिश मशहूर कादियानी विद्वान मौलाना अब्दुल हक़ विद्यार्थी की जस की तस नक़ल है।

 

कादियानी मुहीम का दावा ही यह था कि वेद प्रथम ईश्वरीय किताब हैं और मिर्जा गुलाम आखिरी पैगम्बर। वेद मन्त्रों के गलत अर्थ लगाने और हेर-फेर करने की उनकी कोशिश को हम नाकाम कर चुके हैं, देखें – ‘वेदों में पैगम्बर‘। लेकिन इतनी कमजानकारी और इतनी सीमाओं के बावजूद वेदों को प्रथम ईश्वरीय पुस्तक के रूपमें मुसलमानों के बीच मान्यता दिलवाने की उनकी कोशिश काबिले तारीफ है।

 

मूलतः यह धारणा कि वेद ईश्वरीय नहीं हैं – ईश्वर को न मानने वालों और साम्यवादियों की है। हालाँकि वे वेदों को प्राचीनतम तो मानते हैं। उनकी इस कल्पना की जड़ इस सोच में है कि मनुष्य सिर्फ कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं का पुतला मात्र है। खैर, यह लेख नास्तिकों और साम्यवादियों की खोखली दलीलों और उनकी रासायनिक प्रक्रियाओं के अनुत्तरित प्रश्नों पर विचार करने के लिए नहीं है।

 

गौर करने वाली बात यह है कि नास्तिकों के इस मोर्चे को अब कई हताश मुस्लिमों ने थाम लिया है, जो अपने लेखों से वेदों की ईश्वरीयता को नकारने में लगे हुए हैं। पर अपने जोश में उन्हें यह होश नहीं है कि इस तरह वे अपने ही विद्वानों को झुठला रहेहैं और इस्लाम की मूलभूत अवधारणाओं को भी ख़त्म कर रहे हैं। हम उन से निवेदन करना चाहेंगे कि पहले वे अपने उन विद्वानों के खिलाफ फ़तवा जारी करें – जो वेदों को प्रथम ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं या उन में मुहम्मद को सिद्ध करनेकी कोशिश करते हैं, साथ ही अपनी नई कुरान को निष्पक्षता से देखने की दरियादिली दिखाएं।

 

इस लेखमें हम यह जानेंगे कि ऋषियों को वेदों का रचयिता क्यों नहीं माना जा सकता ? जैसा कि नास्तिकों और इन नए मुस्लिमों का कहना है। अब प्रश्न उठता है कि यदि ऋषियों ने वेद नहीं बनाए तो फिर वेदों का रचयिता कौन है? यह प्रश्न ऐसा ही है जैसे यह पूछना कि यह जीवन किस ने बनाया? यह ब्रह्माण्ड किस ने बनाया? कौन है जो इस निपुणता से सब कुछ संचालित कर रहा है? यह बुद्धिमत्ता हमें किस ने दी है? केवल मनुष्य ही क्यों बुद्धिमान प्राणी है? इत्यादि।

 

ये प्रश्न आत्ममंथन और विश्लेषण मांगते हैं और हम इन पर निश्चित मत रखते हैं। लेकिन क्योंकि वेद सभी को अपने विवेक से सोचने की छूट देते हैं इसलिए यदि कोई हमारे नजरिए और विचारों से सहमत न भी हुआ तो इस का मतलब यह नहीं है वेद उसे नरक की आग में झोंक देंगे और हम कहीं स्वर्ग में अंगूरों का मजा लेंगे। बल्कि यदि कोई सच की तलाश में अपनी पूरी समझ और ईमानदारी से लगता है तो ईश्वर उसे उचित उत्तम फल देते हैं। वैदिक सिद्धांतों और अंधश्रद्धावादी विचारधारा में यही फरक है। वैदिक सिद्धांतों का आधार कोई अंध श्रद्धा नहीं है और न ही कोई दबाव है, सिर्फ वैज्ञानिक और व्यवहारिक दृष्टिकोण के प्रतिवचनबद्धता है।

 

इस परिचय के बाद, आइए अब जाँच शुरू करें – पहले हम वेदों को ऋषिकृत बतलाने वालों का पक्ष रखेंगे और उसके बाद अपने उत्तर और तर्क देंगे।

 

 अवैदिक दावा –

 

वेद ईश्वरीय नहीं हैं। वे भी रामायण, महाभारत, कुरान इत्यादि की तरह ही मानव रचित हैं। सिर्फ इतना फ़रक है कि रामायण और महाभारत के रचनाकार एक-एक ही थे और वेद, गुरु ग्रन्थ साहिब की ही तरह समय-समय पर अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा लिखे जाते रहे। इसलिए, वेद अनेक व्यक्तियों के कार्य का संग्रह मात्र हैं। इन्हीं को बाद में ‘ऋषि‘ कहा जाने लगा और आगे चलकर वेदों को ’अपौरुषेय‘ सिद्ध करने के लिए ही इन ‘ऋषियों‘ को ‘दृष्टा‘ कहा गया। कई ग्रन्थ स्पष्टरूप से ऋषियों को ‘मन्त्रकर्ता‘ कहते हैं, उदाहरण: ऐतरेय ब्राह्मण ६.१, ताण्ड्य ब्राह्मण १३.३.२४, तैत्तिरीय आरण्यक ४.१.१, कात्यायन श्रौतसूत्र३.२.८, गृहसूत्र २.१.१३, निरुक्त ३.११, सर्वानुक्रमणी परिभाषा प्रकरण २.४ , रघुवंश ५.४। आज प्रत्येक वेद मन्त्र का अपना ऋषि है -वह व्यक्ति जिसने उसमन्त्र को रचा है। इसलिए ऋषियों को वेद मन्त्रों का रचयिता न मानना एक अन्धविश्वास ही है।

 

उत्तर-

 

ऋषियों को मन्त्रों का रचयिता मानने के इस दावे का आधार ‘मन्त्रकर्ता‘ शब्द या उसके मूल का किसी रूप में मौजूद होना है। हम इस पर विचार बाद में करेंगे। आइए, पहले युक्ति संगत और ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह जानें कि ऋषि वेदमन्त्रों के रचयिता क्यों नहीं माने जा सकते ? सबसे पहले इस दावे को लेते हैं- “प्रत्येक वेद मन्त्र का अपना ऋषि है -वह व्यक्ति जिसने उस मन्त्र को रचा है।”

 

(इस धारणा को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि मूल वेद संहिताओं में किसी ऋषि आदि का नाम समाहित नहीं है। उनमें सिर्फ वेद मन्त्र हैं। लेकिन, जिन ऋषियों ने सर्वप्रथम अपने ध्यान में जिस वेद मन्त्र या सूक्त के अर्थ को देखा या जाना उन ऋषियों के नामों का उल्लेख परम्परागत रूप से उस मन्त्र या सूक्त पर मिलता है। कात्यायन की ‘सर्वानुक्रमणी‘ या ‘सर्वानुक्रमणिका‘ इन ऋषियों के नामों का मूल स्त्रोतमानी गयी है (कुछ अन्य अनुक्रमणियों के अलावा।) अवैदिक लोग इन ऋषियों को वेद मन्त्रों का शोधकर्ता मानने के बजाए रचयिता मानते हैं।)

प्रतिवाद :

1. एक सूक्त के अनेक ऋषि:

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a. इतिहास में ऐसी किसी रचना का प्रमाण नहीं मिलता जिसे बहुत सारे लोगों ने साथ मिलकर बिलकुल एक जैसा बनाया हो, भाषा या विषय की भिन्नता अनिवार्य है। जबकि वेदों में ऐसे अनेक सूक्त हैं जिनके एक से अधिक ऋषि हैं – दो या सौ या हजार भी।

 

उदाहरण के लिए : सर्वानुक्रमणिका (वैदिक ऋषियों की सूचि) में ऋग्वेद के इन मन्त्रों के एक से अधिक ऋषि देखे जा सकते हैं – ५.२, ७.१०१, ७.१०२, ८.२९, ८.९२, ८.९४, ९.५, ५.२७, १.१००, ८.६७, ९.६६, ९.१६. (आर्षनुक्रमणी).

 

चौबीस अक्षरों वाले गायत्री मन्त्र के ही सौ ऋषि हैं! ऋग्वेद के ८ वें मंडल के ३४ वें सूक्त के हजार ऋषि हैं!

 

अब हजार लोगों ने एक साथ मिलकर तीन वाक्यांश कैसे बनाए? यह तो अवैदिक बुद्धिवादी ही जानें!

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b. कुछ लोग यह दलील दे सकते है कि सर्वानुक्रमणी के लेखक कात्यायन के समय तक ऐतिहासिक परम्परा टूट चुकी थी इसलिये उन्होंने एक मन्त्र के साथ अनेक ऋषियों के नाम ‘वा‘ (या) का प्रयोग करते हुए जोडे कि – इनमें से किसी एक ने यह मन्त्र बनाया है। लेकिन यह दलील देकर प्रश्नों से बचा नहीं जा सकता, यदि आप सर्वानुक्रमणी को विश्वसनीय नहीं मानते तो उसका सन्दर्भ देते ही क्यों हैं?

 

एक उदाहरण देखें – यास्क के निरुक्त में कई मंत्रों के गूढ़ अर्थ दिए गए हैं और वह सर्वानुक्रमणी से पुराना माना गया है। आचार्य शौनक की बृहद्ददेवता मुख्यतः निरुक्त पर ही आधारित है। इसी बृहद्ददेवता का उपयोग कात्यायन ने सर्वानुक्रमणी की रचना में किया था। निरुक्त ४.६ में ऋग्वेद १०.५ का ऋषि ” त्रित” कहा गया है। बृहद्ददेवता३.१३२ – ३.१३६ में भी यही है। जबकि, कात्यायन ने कई ऋषियों का नाम सूचीबद्ध करके उनको ‘वा‘ से जोड़ दिया है। इससे पता चलता है कि कात्यायन द्वारा एक मन्त्र से अनेक ऋषियों के नाम जोड़ने का कारण उस मन्त्र का अनेक ऋषियों द्वारा साक्षात्कार किया जाना है, ऐतिहासिक परम्परा का टूटना नहीं।

 

निरुक्त१.४ के अनुसार ‘वा‘ का प्रयोग केवल ‘विकल्प‘ के रूप में ही नहीं बल्कि ‘समूह‘ का बोध कराने के लिए भी होता है। वैजयंती कोष का मत भी यही है।

 

कात्यायन ने स्वयं भी सर्वानुक्रमणी में ‘वा‘ का उपयोग विभिन्न सन्दर्भों में किया है – परिभाषा प्रकरण में वह स्पष्ट लिखते हैं कि – जब ‘वा‘ का उपयोग करके किसी ऋषि का नाम दिया जाता है तो इसका अर्थ है कि पहले ऋषि के उपरांत इस ऋषि ने भी इस वेद मन्त्र को जाना था। अधिक जानकारी के लिए देखें- ऋग्वेदअनुक्रमणी – ३.२३, ५.२४, ८.४, ९.९८. और यदि हम शौनक रचित आर्षानुक्रमणी ९ .९८ को देखें तो उस में – ‘च‘ (और) का प्रयोग मिलेगा, जहाँ सर्वानुक्रमणी में कात्यायन ‘वा‘ का प्रयोग करते हैं। इसी तरह सर्वानुक्रमणी ८.९२और आर्षानुक्रमणी ८.४० में हम पाएंगे कि जहाँ कात्यायन ने ’वा‘ का प्रयोग करते हैं वहीँ शौनक ‘च‘ का प्रयोग करते हैं। इसी तरह सर्वानुक्रमणी १.१०५। अतः इन से प्रमाणित होता है कि ऋषि वेदों के रचयिता नहीं हो सकते।

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c. कुछ लोग कह सकते हैं कि एक सूक्त के मन्त्र अलग- अलग ऋषियों द्वारा बनाए गए इसलिए एक सूक्त के अनेक ऋषि हैं। परन्तु यह दावा कोई दम नहीं रखता, क्योंकि कात्यायन जैसे ऋषि से इस तरह की भूल होना संभव नहीं है।

 

सर्वानुक्रमणी में ऋग्वेद९ .६६ – ‘पवस्व‘ सूक्त के १०० ‘वैखानस‘ ऋषि हैं, जबकि सूक्त में मन्त्र ही केवल ३० हैं। ३ मन्त्रों के १००० ऋषि भी हम देख चुके हैं।

 

जहाँ कहीं भी – एक सूक्त के मंत्रों को भिन्न-भिन्न ऋषियों ने देखा है -कात्यायन ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जैसे, सर्वानुक्रमणी – ऋग्वेद ९ .१०६ – चौदह मन्त्रों वाले ‘इन्द्र्मच्छ‘ सूक्त में – ‘चक्षुषा‘ ने ३, ‘मानव चक्षु‘ ने ३, ’अप्स्व चक्षु‘ ने ३ और ‘अग्नि‘ ने ५ मन्त्रों के अर्थ अपनी तपस्या से जानें। सर्वानुक्रमणी – ऋग्वेद 5 वें मंडल के 24 वें सूक्त के चारों मन्त्र – चार विभिन्न ऋषियों द्वारा जाने गए। इसी तरह देखें,सर्वानुक्रमणी – ऋग्वेद १०.१७९ और १०.१८१।.

 

इसलिए, एक सूक्त के मन्त्रों को विभिन्न ऋषियों ने बनाया – ऐसा निष्कर्ष निकालना गलत होगा। इसका समाधान यही है कि – ऋषि वह ‘तज्ञ‘ थे जिन्होनें वेद मन्त्रों के अर्थ को जाना था।

 

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2. एक मन्त्र के अनेक ऋषि:

 

– वेदों में ऐसे अनेक मन्त्र हैं जो कई बार, कई स्थानों पर अलग- अलग सन्दर्भों में आए हैं। किन्तु उनके ऋषि भिन्न-भिन्न हैं। यदि ऋषियों को मन्त्र का निर्माता माना जाए तो सभी स्थानों पर एक ही ऋषि का नाम आना चाहिए था।

 

उदाहरण : ऋग्वेद १.२३.१६-१८ और अथर्ववेद १.४.१-३

 

• ऋग्वेद १०.९.१-७ और अथर्ववेद १.५.१-४/ १.६.१-३

• ऋग्वेद १०.१५२.१ और अथर्ववेद १.२०.४

• ऋग्वेद १०.१५२.२-५ और अथर्ववेद १.२१.१-४

• ऋग्वेद १०.१६३.१,२,४ और अथर्ववेद २.३३.१,२,५

• अथर्ववेद ४.१५.१३ और अथर्ववेद ७.१०३.१

• ऋग्वेद १.११५.१ और यजुर्वेद १३.१६

• ऋग्वेद १.२२.१९ और यजुर्वेद १३.३३

• ऋग्वेद १.१३.९ और ऋग्वेद ५.५.८

• ऋग्वेद १.२३.२१-२३ और ऋग्वेद १०.९.७-९

• ऋग्वेद ४.४८.३ और यजुर्वेद १७.९१

 

इन सभी जोड़ियों में ऋषियों की भिन्नता है। ऐसे सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। एक ही मन्त्र के इतने सारे ऋषि कैसे हुए, इसे समझने का मार्ग एक ही है कि हम यह मान लें – ऋषि मन्त्रों के ज्ञाता ही थे, निर्माता नहीं।

 

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3. वेद मन्त्र ऋषियों के जन्म के पहले से विद्यमान थे।

 

इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि वेद मन्त्र – ऋषियों के जन्म से बहुत पहले से ही थे,

फ़िर ऋषि उनके रचयिता कैसे हुए?

 

उदाहरण :

 

• a. सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद १.२४‘ कस्य नूनं ‘ मन्त्र का ऋषि ‘ शुनः शेप ‘ है। वहां कहा गया है कि १५ मन्त्रों के इस सूक्त का ऋषि, अजीगर्त का पुत्र शुनः शेप है। ऐतरेय ब्राह्मण ३३.३, ४ कहता है कि शुनः शेप नेकस्य नूनं मन्त्र से ईश्वर की प्रार्थना की। वररुचि के निरुक्त समुच्चय में इसी मन्त्र से अजीगर्त द्वारा ईश्वर आराधना का उल्लेख है। इस से स्पष्ट है कि पिता -पुत्र दोनों ने इस मन्त्र से ईश्वर प्रार्थना की। यदि शुनः शेप को मन्त्र का रचयिता माना जाए तो यह कैसे संभव है कि उसके पिता भी यह मन्त्र पहले से जानते हों?

 

पिता ने पुत्र से यह मन्त्र सीख लिया हो, ऐसा प्रमाण भी ऐतरेय ब्राह्मण और निरुक्त समुच्चय में नहीं है।

 

स्पष्ट है कि यह मन्त्र अवश्य ही उसके पिता के समय भी था परन्तु इसका ऋषि शुनःशेप ही है। इस से पता चलता है कि ऋषि मन्त्रों के ज्ञाता थे, रचयिता नहीं थे।

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• b. तैत्तिरीय संहिता ५.२.३ और काठक संहिता २०.१० – विश्वामित्र को ऋग्वेद ३.२२ का ऋषि कहते हैं। जबकि सर्वानुक्रमणी ३.२२ और आर्षानुक्रमणी ३.४ के अनुसार यह मन्त्र विश्वामित्र के पिता ‘गाथि‘ के समय भी था। इस मन्त्र के ऋषि गाथि और विश्वामित्र दोनों ही हैं। यह सूचित करता है कि ऋषि मन्त्रों के ज्ञाता थे, रचयिता नहीं थे।

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• c. सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद १०.६१ और ६२ का ऋषि ‘नाभानेदिष्ठ‘ है। ऋग्वेद १०.६२ के१० वें मन्त्र में ‘यदु‘ और ‘तुर्वशु‘ शब्द आते हैं। कुछ लोग इसे ऐतिहासिक राजाओं के नाम मानते हैं। (हम मानते हैं कि यदु और तुर्वशु ऐतिहासिक नाम नहीं हैं किन्तु किसी विचार का नाम हैं।)महाभारत आदिपर्व ९५ के अनुसार यदु और तुर्वशु – मनु की सातवीं पीढ़ी में हुए थे (मनु – इला – पुरुरवा – आयु – नहुष – ययाति – यदु – तुर्वशु.)

महाभारत आदिपर्व ७५.१५ -१६ में यह भी लिखा है कि नाभानेदिष्ठ मनु का पुत्र और इला का भाई था। इसलिए अगर वेदों में इतिहास मानें और यह मानें कि नाभानेदिष्ठ ने इस मन्त्र को बनाया तो कैसे संभव है कि वह अपने से छठीं पीढ़ी के नाम लिखे? इसलिए या तो वेदों में इतिहास नहीं है या नाभानेदिष्ठ मन्त्रों का रचयिता नहीं है।

 

कुछ लोग कहते हैं कि नाभानेदिष्ठ बहुत काल तक जीवित रहा और अंतिम दिनों में उस ने यह रचना की। यह भी सही नहीं हो सकता क्योंकि ऐतरेय ब्राह्मण ५ .१४ के अनुसार उसे गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करके आने के बाद पिता से इन मन्त्रों का ज्ञान मिला था।

 

निरुक्त २.३ के अर्थ अनुसार यदु और तुर्वशु ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं बल्कि एक प्रकार के गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाले मनुष्य हैं।

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• d. ऐतरेय ब्राह्मण ५.१४, तैत्तिरीय संहिता ३.१.३ और भागवत ९.४.१ – १४ में कथा आती है कि नाभानेदिष्ठ के पिता मनु ने उसे ऋग्वेद दशम मंडल के सूक्त ६१ और ६२ का प्रचार करने के लिए कहा। इस से स्पष्ट है कि उसके पिता इन सूक्तों को जानते थे और नाभानेदिष्ठ भले ही इस का ऋषि है पर वह इनका रचयिता नहीं हो सकता।.

• e. ऋग्वेद मन्डल ३ सूक्त ३३ के ऋषि विश्वामित्र हैं, जिसमें ‘विपात‘ और ‘शुतुद्रि‘ का उल्लेख है। निरुक्त २.२४ और बृहद्ददेवता ४.१०५ – १०६ में आई कथा के अनुसार – विश्वामित्रराजा सुदास के पुरोहित थे और वे विपात और शुतुद्रि नामक दो नदियों के संगम पर गए। जबकि महाभारत आदिपर्व १७७.४-६ और निरुक्त ९.२६ में वर्णन है कि महर्षि वशिष्ठ ने इन नदियों का नामकरण – विपात और शुतुद्रि किया था। और यह नामकरण राजा सुदास के पुत्र सौदास द्वारा महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों का वध किए जाने के बाद का है। यदि विश्वामित्र इन मन्त्रों के रचयिता माने जाएँ तो उन्होंने इन नामों का उल्लेख वशिष्ठ से बहुत पहले कैसे किया? सच्चाई यह है कि इन मन्त्रों का अस्तित्व विश्वामित्र के भी पहले से था। और इस में आये विपात और शुतुद्रि किन्हीं नदियों के नाम नहीं हैं। बल्कि बाद में इन नदियों का नाम वेद मन्त्र से लिया गया। क्योंकि वेद सबसे प्राचीनतम पुस्तक हैं इसलिए किसी व्यक्ति या स्थान का नाम वेदों पर से रखा जाना स्वाभाविक है। जैसे आज भी रामायण, महाभारत इत्यादि में आए शब्दों से मनुष्यों और स्थान आदि का नामकरण किया जाता है।

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• f. सर्वानुक्रमणी वामदेव को ऋग्वेद ४.१९, २२, २३ का ऋषि बताती है। जबकि गोपथ ब्राह्मण उत्तरार्ध ६.१ और ऐतरेय ६.१९ में लिखा है कि विश्वामित्रइन मन्त्रों का द्रष्टा (अर्थ को देखने वाला) था और वामदेव ने इस का प्रचार किया। अतः यह दोनों ऋषि मन्त्रों के तज्ञ थे, रचयिता नहीं।

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• g. सर्वानुक्रमणी में ऋग्वेद १०.३० – ३२ का ऋषि ‘कवष ऐलुष‘ है। कौषीतकीब्राह्मण कहता है कि कवष ने ‘भी‘ मन्त्र जाना – इस से पता चलता है कि मन्त्रों को जाननेवाले और भी ऋषि थे। इसलिए ऋषि मन्त्र का रचयिता नहीं माना जा सकता।.

4.’मन्त्रकर्ता‘ का अर्थ ‘मन्त्र रचयिता‘ नहीं :

‘कर्ता‘ शब्द बनता है ‘कृत्‘ से और ‘कृत्‘ = ’कृञ्‘ + ‘क्विप्‘ ( अष्टाध्यायी ३.२.८९ )।

‘कृञ्‘ का अर्थ –

 

• निरुक्त २.११ – ऋषि का अर्थ है -”दृष्टा” (देखनेवाला) करता है, निरुक्त३.११ – ऋषि को “मन्त्रकर्ता “ कह्ता है। अतः यास्क के निरुक्त अनुसार “कर्ता ” ही “मन्त्रद्रष्टा” है। ‘कृञ्‘ धातु ‘करने‘ के साथ ही ‘देखने‘ के सन्दर्भ में भी प्रयुक्त होता है। ’कृञ्‘ का यही अर्थ, सायण ऐतरेयब्राह्मण(६.१) के भाष्य में, भट्ट भास्कर तैत्तरीय आरण्यक (४.१.१) के भाष्य में और कात्यायन गर्ग श्रौतसूत्र (३.२.९) की व्याख्या में लेते हैं।

 

• मनुस्मृति में ताण्ड्य ब्राह्मण (१३.३.२४) की कथा आती है। जिसमें मनु “मन्त्रकर्ता” का अर्थ मन्त्र का “अध्यापक” करते हैं। इसलिए ‘कृञ्‘ धातु का अर्थ “पढ़ाना” भी हुआ। सायण भी ताण्ड्य ब्राह्मण की इस कथा में “मन्त्रकर्ता” का अर्थ “मन्त्र दृष्टा” ही करते हैं।

 

• अष्टाध्यायी (१.३.१) पतंजलि भाष्य में ‘कृञ्‘ का अर्थ “स्थापना” या “अनुसरण” करना है।

 

• जैमिनी के मीमांसा शास्त्र (४.२.३) में ’कृञ्‘ का अर्थ “स्वीकारना” या “प्रचलित” करना है।

 

• वैदिक या उत्तर वैदिक साहित्य में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि “मन्त्रकर्ता” या “मन्त्रकार” या इसी तरह का कोई दूसरा शब्द मन्त्रों के रचयिता के लिए प्रयुक्त हुआ हो।

 

• सर्वानुक्रमणी (परिभाषा २.४) में स्पष्ट रूप से मन्त्र का ‘ दृष्टा‘ या मन्त्र के अर्थ का ‘ज्ञाता‘ ही, उस का “ऋषि” है।

 

• अत: अवैदिक लोगों ने जितने भी सन्दर्भ ऋषियों को ‘मन्त्रकर्ता‘ बताने के लिए दिए, उन सभी का अर्थ ‘मन्त्रदृष्टा‘ है।

 

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प्राचीन साहित्य में ‘मन्त्रदृष्टा‘ के कुछ उदाहरण :

 

• तैत्तिरीय संहिता१.५.४, ऐतरेय ब्राह्मण ३.१९, शतपथ ब्राह्मण ९.२.२.३८, ९.२.२.१, कौषीताकिब्राह्मण १२.१, ताण्ड्य ब्राह्मण ४.७.३, निरुक्त २.११, ३.११, सर्वानुक्रमणी२.१, ३.१, ३.३६, ४.१, ६.१, ७.१, ७.१०२, ८.१, ८.१०, ८.४२, बृहद्ददेवता १.१, आर्षानुक्रमणी १.१, अनुवाकानुक्रमणी २,३९,१.१।

 

• अचरज की बात है कि जिन मन्त्रों का हवाला देकर अवैदिक दावा करते हैं कि इनको ऋषियों ने बनाया, वही बताते हैं कि ऋषि इनके ‘ज्ञाता‘ या ‘दृष्टा‘ थे। अत: यह गुत्थी यहीं सुलझ जाती है।

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• शंका: वेदों में आए नाम जैसे विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज इत्यादि जो वेद मन्त्रों के ऋषि भी हैं और ऐतिहासिक व्यक्ति भी, इनके लिए आप क्या कहेंगे ?

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• समाधान: यह सभी शब्द ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम नहीं अपितु विशेष गुणवाचक नाम हैं। जैसे शतपथ ब्राह्मण में आता है कि प्राण मतलब वशिष्ठ, मन अर्थात भरद्वाज, श्रोत (कान) मतलब विश्वामित्र इत्यादि। ऐतरेय ब्राह्मण २.२१ भी यही कहता है। ऋग्वेद ८.२.१६ में कण्व का अर्थ – मेधावी व्यक्ति है – निघण्टु (वैदिककोष) के अनुसार।

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• शंका: इसका क्या कारण है कि कई मन्त्रों के ऋषि वही हैं, जो नाम स्वयं उस मन्त्र में आए हैं?

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• समाधान: आइए देखें कि किसी को कोई नाम कैसे मिलता है। नाम या तो जन्म के समय दिया जाता है या अपनी पसंद से या फिर अपने कार्यों से या प्रसिद्धि से व्यक्ति को कोई नाम मिलता है। अधिकतर महापुरुष अपने जन्म नाम से अधिक अपने कार्यों या अपने चुने हुए नामों से जाने जाते हैं। जैसे पं.चंद्रशेखर “आजाद” कहलाए, सुभाषचन्द्र बोस को “नेताजी” कहा गया, मूलशंकर को हम “स्वामी दयानंद सरस्वती” कहते हैं, मोहनदास “महात्मा” गाँधी के नाम से प्रसिद्ध हैं। ”अग्निवीर” कहलाने वालों के असली नाम भी शायद ही कोई जानता हो।

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• इसी तरह जिस ऋषि ने जिस विषय का विशेष रूप से प्रतिपादन या शोध किया – उनका वही नाम प्रसिद्ध हुआ है।- ऋग्वेद १०.९० पुरुष-सूक्त – जिसमें विराट पुरुष अथवा परमेश्वर का वर्णन है – का ऋषि “नारायण” है – जो परमेश्वर वाचक शब्द है।

– ऋग्वेद १०.९७ – जिसमें औषधियों के गुणों का प्रतिपादन है, इसका ऋषि “भिषक् ” अर्थात वैद्य है।

– ऋग्वेद १०.१०१ का ऋषि “बुध: सौम्य” है अर्थात बुद्धिमान और सौम्य गुणयुक्त – यह इस सूक्त के विषय अनुरूप है।

• ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिलेंगे।

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• वैदिक ऋषियों को अपने नामों की प्रसिद्धि की लालसा नहीं थी। वे तो जीवन – मृत्युके चक्र से ऊँचे उठ चुके, वेदों के अमृत की खोज में समर्पित योगी थे। इसलिए नाम उनके लिए केवल सामाजिक औपचारिकता मात्र थे।• महर्षि दयानंद के शब्दों में – “जिस-जिस मंत्रार्थ का दर्शन जिस -जिस ऋषि को हुआ और प्रथम ही जिसके पहिले उस मन्त्र का अर्थ किसी ने प्रकाशित नहीं किया था; किया और दूसरों को पढाया भी। इसलिए अद्यावधि उस-उस मन्त्र के साथ ऋषि का नाम स्मरणार्थ लिखा आता है। जो कोई ऋषियों को मन्त्र कर्ता बतलावें उनको मिथ्यावादी समझें। वे तो मन्त्रों के अर्थप्रकाशक हैं।”

• इन मन्त्रों का रचयिता भी वही – इस ब्रह्माण्ड का रचयिता – विराट पुरुष है। जिसने यह जीवन, यह बुद्धि, यह जिज्ञासा और यह क्षमता प्रदान की, जिससे हम जान सकें कि ‘ वेद किसने रचे?’ भले ही कोई इस पर असहमत हो फिर भी – वेदों के रचयिता के बारे में सबसे अच्छा और प्रामाणिक समाधान यही है।

 

सन्दर्भ: पं.युधिष्टिरमीमांसक, पं.धर्मदेव विद्यामार्तंड, पं.भगवदत्त, आचार्य वैद्यनाथशास्त्री, पं.शिव शंकर शर्मा और अन्य वैदिक विद्वानों के कार्य।

 

पहले यह प्रश्नोत्तरी पढ गाय के बारे में जानें फिर नीचे वैज्ञानिक और अध्यात्मिक कारण पढें

भगवान कृष्ण ने किस ग्रंथ में कहा है ‘धेनुनामसिम’ मैं गायों में कामधेनु हूं?

- श्रीमद् भगवतगीता |

* ‘चाहे मुझे मार डालो पर गाय पर हाथ न उठाओ’ किस महापुरुष ने कहा था?

- बाल गंगाधर तिलक |

* रामचंद्र ‘बीर’ ने कितने दिनों तक गौहत्या पर रोक लगवाने के लिए अनशन किया?

-- 70 दिन |

* पंजाब में किस शासक के राज्य में गौ हत्या पर मृत्यु दंड दिया जाता था?

-- पंजाब केसरी महाराज रणजीत सिंह |

* गाय के घी से हवन पर किस देश में वैज्ञानिक प्रयोग किया गया?

-- रूस |

* गोबर गैस संयंत्र में गैस प्राप्ति के बाद बचे पदार्थ का उपयोग किस में होता है?

-- खेती के लिए जैविक (केंचुआ) खाद बनाने में |

* मनुष्य को गौ-यज्ञ का फल किस प्रकार होता है?

-- कत्लखाने जा रही गाय को छुड़ाकर उसके पालन-पोषण की व्यवस्था करने पर |

* एक तोला (10 ग्राम) गाय के घी से यज्ञ करने पर क्या बनता है?

- एक टन आँक्सीजन |

* ईसा मसीहा का क्या कथन था?

-- एक गाय को मरना, एक मनुष्य को मारने के समान है |

* प्रसिद् मुस्लिम संत रसखान ने क्या अभिलाषा व्यक्त की थी?

-- यदि पशु के रूप में मेरा जन्म हो तो मैं बाबा नंद की गायों के बीच में जन्म लूं |

* पं. मदन मोहन मालवीय जी की अंतिम इच्छा क्या थी?

-- भारतीय संविधान में सबसे पहली धारा सम्पूर्ण गौवंश हत्या निषेध की बने |

* भगवान शिव का प्रिय श्री सम्पन्न ‘बिल्वपत्र’ की उत्पत्ति कहा से हुई है?

-- गाय के गोबर से |

* गौवंशीय पशु अधिनियम 1995 क्या है?

-- 10 वर्ष तक का कारावास और 10,000 रुपए तक का जुर्माना |

* गाय की रीढ़ में स्थित सुर्यकेतु नाड़ी से क्या होता है?

-- सर्वरोगनाशक, सर्वविषनाशक होता है |

* देशी गाय के एक ग्राम गोबर में कम से कम कितने जीवाणु होते है?

-- 300 करोड़ |

* गाय के दूध में कौन-कौन से खनिज पाए जाते है?

-- कैलिशयम 200 प्रतिशत, फास्फोरस 150 प्रतिशत, लौह 20 प्रतिशत, गंधक 50 प्रतिशत, पोटाशियम 50 प्रतिशत, सोडियम 10 प्रतिशत, पाए जाते है|

* ‘गौ सर्वदेवमयी और वेद सर्वगौमय है’, यह युक्ति किस पुराण की है?

-- स्कन्द पुराण |

* विश्व की सबसे बड़ी गौशाला का नाम बताइए?

-- पथमेड़ा, राजस्थान |

* गाय के दूध में कौन-कौन से विटामिन पाए जाते है?

-- विटामिन C 2 प्रतिशत, विटामिन A (आई.क्यू) 174 और विटामिन D 5 प्रतिशत |

* यदि हम गायों की रक्षा करेंगे तो गाय हमारी रक्षा करेंगी ‘यह संदेश किस महापरुष का है?

-- पंडित मदन मोहन मालवीय का |

* ‘गौ’ धर्म, अर्थ, काम और 

मोक्ष की धात्री होने के कारण कामधेनु है| इसका अनिष्ट चिंतन ही पराभव का कारण है| यह विचार किनका था?

-- महर्षि अरविंद का |

* भगवान बालकृष्ण ने गायें चराने का कार्य किस दिन से प्रारम्भ किया था?

-- गोपाष्टमी से |

*कितने संतो की हत्या कांग्रेस इंदिरा सरकार ने करवाई जो गौ हत्या का विरोध कर रहे थे?

-- इंदिरा गांधी सरकार नें २०० से ज्यादा संतो को गोली से भूनवा दिया था जो कि परम् पुज्य स्वामी कपात्री जी महराज के अगुवाई में गौ हत्या बंद करवाने के लिए शांतिपूर्ण अंशन कर रहे थे और उन्होने श्राप दिया था कहा जाता है कि इंदिरा गांधी की मृत्यु इसी कारण गोपाष्टमी के दिन हुई और इतनी खतरनाक हुई की भारत हिल गया पर मरने के बाद भी इंदिरा ने हजारों सिखों की बलि ले ली १९८४ दंगों में|

* श्री राम ने वन गमन से पूर्व किस ब्राह्मण को गायें दान की थी?

-- त्रिजट ब्राह्मण को |

* ‘जो पशु हां तों कहा बसु मेरो, चरों चित नंद की धेनु मंझारन’ यह अभिलाषा किस मुस्लिम कवि की है?

-- रसखान |

* ‘यही देहु आज्ञा तुरुक को खापाऊं, गौ माता का दुःख सदा मैं मिटआऊँ‘ यह इच्छा किस गुरु ने प्रकट की?

- गुरु गोबिंद सिंह जी ने |

भारत में पिछले हजारों सालों से पूजी जाती हैं इसका वैज्ञानिक कारण है कि जब हम इसे पुज्यनीय समझेगे तो इसका संरक्षण करेंगे और घर में रखेंगे जिससे हम इसके उत्पादों का व्यवसायिक और स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे|

अध्यात्मिक कारण ये है की सिर्फ गाय ही ऐसा जीव है जिसके हर अंग और हर उत्पाद में भगवान का रूप बताया गया जैसे गले में शिव स्तन में मोहन,गोबर में धनवंतरी  और गौमूत्र में लक्ष्मी दूसरा कारण मृत्यु के बाद जब आदमी मरता है तो वैतरणी नदी पार कर यमराज के दरबार में न्याय के लिए जाना होता है जंहा आपके कर्मानुसार स्वर्ग और नरक का निर्णय होता है अत: इस नदी को पार करने के लिए गाय जरूरी है इसीलिए मरणोपरान्त गौपूजा और गौदान किसी उचित ब्राम्हण के हांथो संपन्करवाया जाता है|

 

 

संसार के समस्त धर्मों में कहा गया है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता है वरन वह किसी ना किसी रूप में बना ही रहता हे। जैसे मनुष्य कपड़ों को समय समय पर बदलते रहते है उसी तरह जीव को भी शरीर बदलने पड़ते है जिस प्रकार तमाम जीवन भर एक ही कपड़ा नहीं पहना जा सकता है उसी प्रकार आत्मा अनन्त समय तक एक ही शरीर में नही ठहर सकती है।

 

ना जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय भूत्वा भविता वा न भूपः

 

ऊजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।

 

गीता.2ए अध्याय.20

 

अर्थात आत्मा ना तो कभी जन्म लेती है और ना ही मरती है मरना जीना तो शरीर का धर्म है शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता है। विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी भी नष्ट नहीं होता है वरन् उसके रूप में परिवर्तन हो जाता है।

 

व्यक्ति के सत्संस्कार होने के बाद यही अक्षय आत्मा पित्तर रूप में क्रियाशील रहती है तथा अपनी आत्मोन्नति के लिये प्रयासरत रहने के साथ पृथ्वी पर अपने स्वजनों एवं सुपात्रों की मदद के लिये सदैव तैयार रहती है।

पितृ पक्ष का हिन्दू धर्म/संस्कृति में बड़ा महत्व

 

पितृ पक्ष का हिन्दू धर्म तथा हिन्दू संस्कृति में बड़ा महत्व है। श्रद्धापूर्वक पित्तरों के लिये किया गया कर्म श्राद्ध कहलाता है, जो पित्तरों के नाम पर श्राद्ध तथा पिण्डदान नहीं करता है वह हिन्दू नहीं माना जा सकता है। हिन्दूशास्त्रों के अनुसार मृत्यु होने पर जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती है तथा ऊँची उठकर पितृलोक में पहुँचती है इन मृतात्मओं को शक्ति प्रदान करने के लिये पिण्डदान और श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्‍त होकर केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि की आवश्यकता नहीं रहती। सूक्ष्म शरीर में चेतना और भावना की प्रधानता रहती है। ऐसे में पितरों को हमसे केवल आदर,श्रद्धा की ही आकांक्षा होती है। वे इसी से तृप्त हो जाते है। इसीलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध एवं तर्पण किए जाते हैं। इन क्रियाओं का विधि-विधान बहुत ही सरल और कण खर्चे का है, सभी व्यक्ति इसे बहुत ही आसानी से संपन्न कर सकते है। पित्तरों के के नाम पर दान-पुण्य करके ब्राहम्णों को भोजन भी कराया जाता है। इसके पुण्यफल से ही पित्तर संतुष्ट रहते है।

 

पित्तरों के लिये श्राद्ध प्रत्येक वर्ष 2 बार किया जाता है। प्रथम मृत्यु की तिथि पर द्वितीय पित्तर पक्ष में। वर्ष में जिस माह की जिस तारीख में पित्तर की मृत्यु हुयी है उस तिथि को किया जाने वाला श्राद्ध “एकोदिष श्राद्ध” कहलाता है।

 

इसमें उस पित्तर की संतुष्टि के लिये उस दिन एक पिण्ड का दान किया जाता है तथा एक ब्राहमण को भोजन कराया जाता है।

 

द्वितीय अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की जिस तिथि को पित्तर की मृत्यु हुयी थी उस दिन किया जाने वाला श्राद्ध “पाण श्राद्ध” कहलाता है। कहते है अश्विन मास में हमारे पित्तर अपने पृथ्वी लोकवासी सगे-सम्बन्धियों के घर बिना बुलाये आते है और ‘काव्य’ ग्रहण करके तृप्त होते है तथा अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते है।

 

शास्त्रों के अनुसार जिन व्यक्तियों की अकाल-मृत्यु (दुर्घटना, हत्या, सर्पदंश, आत्महत्या आदि) हुई हो, उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को ही किया जाता है। सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी को ही किया जाना उचित है। नवमी तिथि माता के श्राद्ध के लिए सबसे उत्तम है। संन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी को किया जाता है। पूर्णिमा को मृत्यु प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध केवल भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा अथवा आश्विन में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ही किया जाना चाहिए । नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही करना उचित माना गया है ।

 

वैसे तो पितृपक्ष में किये जाने वाले श्राद्ध में नौ ब्राहमणें को भोजन कराना चाहिये लेकिन वर्तमान समय में यदि एक ब्राहमण को भी श्रृद्धापूर्वक आदर सहित भोजन कराया जाय तो वह भी पर्याप्त है। उस दिन उस ब्राहमण को ही पितृदेवता समझकर उनका स्वागत सत्कार करना चाहिये तथा उन्हे पूर्ण रूप से संतुष्ट करके ही स्वयं भोजन करना चाहिये। इस दिन ब्राहमणों को अतिरिक्त एक-एक ग्रास गाय, कौआ, कुत्ता तथा चीटियों के लिये भी निकालना चाहिये।

 

श्राद्ध का अर्थ ही श्रद्धा भाव से किया गया कर्म है यदि श्राद्धकर्ता निर्धन हो, ब्राहमण को भोजन ना भी करा पाये तो पित्तरों के नाम से गाय को हरा चारा ही डाल दे तथा श्रद्धा से पित्तरों से विनम्र निवेदन कर ले कि मेरे पास आपके लिये आदर श्रद्धा एवं भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, आप मुझे क्षमा करके मुझ पर एवं मेरे परिवार पर कृपा करें तब भी पित्तर प्रसन्न हो जाते है।

 

पितृ अत्यंत दयालु तथा कृपालु होते हैं, वह अपने पुत्र-पौत्रों से पिण्डदान तथा तर्पण की आकांक्षा रखते हैं। श्राद्ध तर्पण आदि द्वारा पितृ को बहुत प्रसन्नता एवं संतुष्टि मिलती है। शास्त्रों के अनुसार अमावस्या बरसी और पूरे श्राद्ध पक्ष में पितृगण वायुरूप में अपने वंशजों के घर के दरवाजे पर खड़े रहते हैं और अपने स्वजनों से तर्पण, श्राद्ध की उम्मीद करते हैं। वे सूर्यास्त तक भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से अपने-अपने लोकों को लौट जाते हैं। अतःइन दिनों इनका श्राद्ध, तर्पण, ब्राह्मण भोजन अवश्य करना चाहिए।

जैसे पशुओं के भोजन को तृण और मनुष्यों का भोजन को अन्न कहते , वैसे ही देवता और पितरों का भोजन अन्न का 'सार तत्व' है। सार तत्व का अर्थ है गंध, रस और उष्मा। देवता और पितर दोनों ही गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं। लेकिन दोनों के लिए अलग अलग तरह के गंध और रस होते है।अत: जो भी वस्तुएं हम श्रद्धा से अपने पूर्वजों को अर्पित करते है वह उन तक सार तत्व के रूप में पहुँच जाती है।

 

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।

आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।

पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।

देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।

देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।

 

हमारे पितृ मृत्यु के बाद जिस लोक में रहते है वह पितृ लोक कहलाता हैं। यह चांद के पास है इस लिए इसे सोम लोक भी कहा जाता है । पित्रों के एक दिन 30 मानव दिनों के समान होते हैं। एक महीने में एक बार मात्र अमावास्य पर जो उनके लिए दोपहर का खाने का समय है पितृ तर्पण करने से, उनके निमित ब्राह्मण भोजन कराने से, दान देने से उनको महान संतोष की प्राप्ति होती है वह पूर्ण रूप से तृप्त हो जाते है।

 

"समयानुसार श्राद्ध, तर्पण करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।"

 

पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। तर्पण करते समय एक पीतल के बर्तन में जल में गंगाजल , कच्चा दूध, तिल, जौ, तुलसी के पत्ते, दूब, शहद और सफेद फूल आदि डाल कर फिर एक लोटे से पहले देवताओं, ऋषियों, और सबसे बाद में पितरों का तर्पण करना चाहिए।

 

तर्पण, श्राद्ध में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर देवताओं का तर्पण करते समय पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके देवताओं का नाम लेकर एक एक बार तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।

 

ऋषियों का तर्पण करते समय उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके दो बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली के दोनों तरफ से जल गिराते हुए जलांजलि दें ।

 

अंत में पितरों का तर्पण करते समय दक्षिण दिशा की तरफ मुँह करके तीन बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि, तपरान्तयामि कहकर पितृ तीर्थ यानी अंगूठे की ओर जलांजलि देते हुए जल को धरती में किसी बर्तन में छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है। ध्यान रहे तर्पण का जल तर्पण के बाद किसी वृक्ष की जड़ में चड़ा देना चाहिए वह जल इधर उधर बहाना नहीं चाहिए ।

 

हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक शहद , डेढ़ प्रहर तक दूध और साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त होता है। अत: हमें सुबह सवेरे ही तर्पण करना चाहिए ।

 

इन पितृ-कर्मों को करने के दौरान अपने पूर्वजों के उपकारों का अवश्य ही स्मरण करें। उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा कृतज्ञता तथा सम्मान की भावना रखें। उनके प्राप्ति हमारी इस प्रकार की भावनाएं जितनी ही प्रबल होंगी, पितरों को उतनी ही अधिक तृप्ति प्राप्त होगी ।

 

हमारे पूर्वज, पितर जो कि अनेक प्रकार की कष्टकारक योनियों में अतृप्ति, अशांति, असंतुष्टि का अनुभव करते हैं एवं उनकी सद्गति या मोक्ष किसी कारणवश नहीं हो पाता तो हमसे वे आशा करते हैं कि हम उनकी सद्गति या मोक्ष का कोई साधन या उपाय करें जिससे उनका अगला जन्म हो सके एवं उनकी सद्गति या मोक्ष हो सके। उनकी भटकती हुई आत्मा को संतानों से अनेक आशाएं होती हैं एवं यदि उनकी उन आशाओं को पूर्ण किया जाए तो वे आशिर्वाद देते हैं। यदि पितर असंतुष्ट रहे तो संतान की कुण्डली दूषित हो जाती है एवं वे अनेक प्रकार के कष्ट, परेशानीयां उत्पन्न करते है, फलस्वरूप कष्टों तथा र्दुभाग्यों का सामना करना पडता है।

पित्रुओं की शांति, तर्पण आदि न करने से पाप

 

पित्रुओं की शांति एवं तर्पण आदि न करने वाले मानव के शरीर का रक्तपान पित्रृगण करते हैं अर्थात् तर्पण न करने के कारण पाप से शरीर का रक्त शोषण होता है।

पितृदोष की शांति हेतु त्रिपिण्डी श्राद्ध, नारायण बलि कर्म, महामृत्युंजय मंत्रत्रिपिण्डी श्राद्ध यदि किसी मृतात्मा को लगातार तीन वर्षों तक श्राद्ध नहीं किया जाए तो वह जीवात्मा प्रेत योनि में चली जाती है। ऐसी प्रेतात्माओं की शांति के लिए त्रिपिण्डी श्राद्ध कराया जाता है।नारायण बलि कर्म यदि किसी जातक की कुण्डली में पित्रृदोष है एवं परिवार मे किसी की असामयिक या अकाल मृत्यु हुई हो तो वह जीवात्मा प्रेत योनी में चला जाता है एवं परिवार में अशांति का वातावरण उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में नारायण बलि कर्म कराना आवश्यक हो जाता है।महामृत्युंजय मंत्र महामृत्युंजय मंत्र जाप एक अचूक उपाय है। मृतात्मा की शांति के लिए भी महामृत्युंजय मंत्र जाप करवाया जा सकता है। इसके प्रभाव से पूर्व जन्मों के सभी पाप नष्ट भी हो जाते है।

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       महत्वपूर्ण जानकारी 

सभी ऋषि प्रमुख थे और सबका कार्य बहुत ही वृहद और महत्वपूर्ण था जिनमें कुछ का वर्णन निम्नवत है|

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अंगिरा ऋषि? ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

 

विश्वामित्र ऋषि? गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

 

वशिष्ठ ऋषि? ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

 

कश्यप ऋषि? मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

 

जमदग्नि ऋषि? भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

 

अत्रि ऋषि? सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

 

अपाला ऋषि? अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

 

नर और नारायण ऋषि?  ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

 

पराशर ऋषि? ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

 

भारद्वाज ऋषि? बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

 

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

 

वेदों के रचयिता ऋषि ? ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। 

 

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- १.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक। 

 

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- 

 

वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।

विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

 

 अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

 

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

 

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

 

१. वशिष्ठ? राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

 

२. विश्वामित्र? ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

 

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। 

 

३. कण्व? माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

 

४. भारद्वाज? वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

 

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं। 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

 

५. अत्रि? ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

 

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

 

६. वामदेव? वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। 

 

७. शौनक? शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे। 

 

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

 

इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।वंही शांडिल्य, सुश्रुत , चरक, वागभट्ट , भारद्वाज , भास्कराचार्य , आर्यभट्ट, वाराहमिहिर आदि का योगदान भी अतुलनीय है|

जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। 

गोलिया मंगल 'पगड़ी मंगल' तथा चुनड़ी मंगल :जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है। 

मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हों तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।

मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है। 

शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए।

ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो 'पीपल' विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें। 

मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं। 

 
विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है। 

मांगलिक-दोष दूर करते हैं मंगल के 21 नाम। निम्न 21 नामों से मंगल की पूजा करें। 
1. ऊँ मंगलाय नम: 
2. ऊँ भूमि पुत्राय नम:
3. ऊँ ऋण हर्वे नम: 
4. ऊँ धनदाय नम: 
5. ऊँ सिद्ध मंगलाय नम: 
6. ऊँ महाकाय नम:
7. ऊँ सर्वकर्म विरोधकाय नम: 
8. ऊँ लोहिताय नम:
9. ऊँ लोहितगाय नम:
10. ऊँ सुहागानां कृपा कराय नम:
11. ऊँ धरात्मजाय नम: 
12. ऊँ कुजाय नम: 
13. ऊँ रक्ताय नम: 
14. ऊँ भूमि पुत्राय नम: 
15. ऊँ भूमिदाय नम: 
16. ऊँ अंगारकाय नम: 
17. ऊँ यमाय नम: 
18. ऊँ सर्वरोग्य प्रहारिण नम: 
19. ऊँ सृष्टिकर्त्रे नम: 
20. ऊँ प्रहर्त्रे नम: 
21. ऊँ सर्वकाम फलदाय नम: 

विशेष: किसी ज्योतिषी से चर्चा करके ही पूजन करना चाहिए। मंगल की पूजा का विशेष महत्व होता है। अपूर्ण या कुछ जरूरी पदार्थों के बिना की गई पूजा प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकती है।

संदर्भ- वेबदुनिया

ज्योतिष् शास्त्र के अनुसार काल सर्प दोष कैसे पहचाने और उस का उपचार कैसे करें. पढ़िए काल सर्प दोष के बारे में.

ज्योतिष् शास्त्र के मुताबिक अगर किसी की कुंडली में सर्प दोष बनता है तो ऐसी योग में उत्पन्न जातक के व्यवसाय, धन, परिवार, संतान आदि के कारण जीवन अशांत हो जाता है.

राहु केतु को छाया ग्रह कहा जाता है. राहु केतु के कारण ही कालसर्प दोष बनता है क्योंकि राहु का नक्षत्र भारणी है.भारणी का स्वामी काल है. केतु का नक्षत्र आश्लेशा है और इस नक्षत्र के स्वामी सर्प है. इसलिए इनके प्रभाव में आते ही काल सर्प दोष कुंडली में बन जाता है.
 
जातक की कुंडली में काल सर्प दोष है या नही, यह हम कैसे पहचाने.

सर्प दोष वाले जातक को सपने में सांप दिखाई देना, पानी देखना, अपने को हवा में उड़ते देखना, अकस्मात मृत्यु तुल्य कष्ट मिलना, कामों में बार-बार रुकावट आनी, विचारों में बार-बार बदलाव कोई भी काम करने से पहले ग़लत सोचना पढ़ाई से मन उचाट होना, नशा करना, यदि इन में से कोई भी लक्षण विद्यमान है तो सर्प दोष विद्यमान है.

इसकी शांति के लिए विद्वान ज्योतिषी ब्राह्मण को दिखाकर काल सर्प दोष की शांति अवश्य करवाएं. काल सर्प दोष की शांति के लिए वैदिक ब्राह्मण के द्वारा समय समय पर रुद्राभिषेक अवश्य करवाएं.

सरल उपाय

1 प्रत्येक संक्रांति को गंगाजल और गोमूत्र का छिड़काव पूरे घर में करें.

2 हर सोमवार को भगवान शिव पर गंगाजल और और गाय के कच्चे दूध से अभिषेक करें.

3 कुत्ते को दूध और रोटी देना.

4 गाय और कौओं को घर की पहली रोटियों में तेल छिड़क कर खिलाना. 

5 सोना 7 रत्ती तांबा 16 रत्ती, चांदी 12 रत्ती मिलकर क्यू सांप के आकर की अंगूठी बनाकर अनामिका उंगली में विशेष महूर्त में प्राण प्रतिष्ठा पूर्वक धारण करें.

6 मोर पंख घर में किसी पवित्र जगह पर रखें और रात्रि में सोने से पहले मोर पंख से हवा करें.

7 भगवान शिव को कम से कम 11 बेल पत्र पर राहु और केतु लिखकर शनिवार के दिन अर्पण करने से भी काल सर्प दोष की शांति होती है. 
 

सादेखे साईं का चरित्र – https://hindurashtra.files.wordpress.com/2013/08/exposesai.pdf

 

यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम्

गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मूर्दा (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत-प्रेत ही बनते हैं.

 

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/04/12/shirdi-sai-baba/

साईं उर्फ़ चाँद मियां की मजार या दरगाह, अब साईं भक्त ये बताये की भगवान् कृष्ण सही है या साईं??

https://hindurashtra.wordpress.com/2013/01/18/548/

साईं एक इस्लामिक बुद्धि का व्यक्ति और और अल्लाह का एक सिपाही है जिसका काम मुर्ख हिन्दुओ को अपने जाल में फस कर इस्लामिक सत्ता कायम करना है यही काम अजमेर के ख्वाजा चिस्ती ने किया था और दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन ने किया.. पर अक्सर लोग इस भूल में जीते रहते है की उनकी तो कब्र है पर साईं की तो मूर्ति है जिसे मुसलमान पूजते है नहीं है और यही पर लोग मुर्ख बन जाते है असल में कुरान के कहे अनुसार साम दाम दंड भेद जैसे भी हो इस्लामी सत्ता कायम करना ही मुसलमानों का फ़र्ज़ है जिसे पूरा करने में साईं ने पूरी इमानदारी दिखाई और आज उसकी इसी बात का फायदा मुसलमान उठा रहे है

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/09/25/159/

शिर्डी से प्रकाशित साईं सत्चरित्र के सन्दर्भ से लिए गए साईं के कुछ कारनामे और साईं के सनातनी विरोधी कुछ कार्य, इसी में साईं के एक मुस्लिम होने का प्रमाण भी है, यही नहीं इसमें साईं के प्रसाद में मांस मिलाने और एक ब्राह्मण को मांस मिला भोजन खिलाने के लिए बाध्य करने के कुछ प्रमाण है,

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/08/13/374/

मेरे एक मित्र एवं एक पूर्व साईं भक्त द्वारा गया मुझे लिखा गया एक पत्र, जिसमे साईं इस्लाम को अच्छा बता कर भारत की संत परम्परा एवं भारतीय मुनियों ऋषियों व् महापुरुषों का अपमान करता है जो सदियों से इस्लामिक पिशाच से लड़ते हुए भारत भूमि को बचाए हुए है..

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/09/10/132/

सनातनी परंपरा में केवल इश्वर, अवतार, या देवता की पूजा ही मान्य है उसके अलावा सभी एक तरह से पाखंड ही है,

चूँकि साईं न इश्वर है न देवता और न अवतार इसलिए वह भी एक प्रकार से पूजनीय व्यक्तियों की श्रेणी में नहीं आता, एक साधारण इंसान होते हुए भी उसे इश्वर की तरह पूजा जाना सनातन धर्म का ही घोर अपमान है.

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/07/26/131/

गीता में भगवान् कृष्ण का सन्देश व् दफनाये गए व्यक्तियों को पूजने पर भगवान् कृष्ण की स्पष्ट चेतावनी,

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/06/26/fake-sai-2/साईं के अवतारी होने का भंडाफोड़ एवं साईं के चमत्कारों का पर्दाफाश,

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/06/26/122/

साईं का पूजन अर्थात सनातनी धर्म का घोर अपमान, क्या एक यावनी(मुसलमान) सनातनी भगवान् हो सकता है, वो यावनी जो हजारो सालो से भारत भूमि को रक्त में डुबोते हुए तलवार के जोर पर हजारो लाखो स्त्रियों का चीरहरण व् करोड़ो भारतवासियों की हत्या करने उनका जबरन धर्मांतरण करा चुके है, साथ ही इस झूठ का गुब्बारा फोड़ना की साईं ने अपने जीवन में समाज के कल्याण के लिए कोई कार्य किये है.

https://hindurashtra.wordpress.com/2012/06/19/fake-sai

 

साईं के कुछ मुर्ख भक्त है जो साईं कटुवे को शिव राम या कृष्ण ने जोड़ रहे है और अपने सनातन धर्म का मखोल उड़ा कर पूरी दुनिया में सनातन धर्म को बदनाम कर रहे है,

ऐसे साईं भक्तो को मेरा खुला चैलेंज, हिम्मत है तो साईं को हिन्दू साबित करे भगवान की बात तो बहुत दूर की है,

ऐसे साईं भक्तो को मेरी सलाह, क्या ये साईं राम शिव से बड़ा हो गया,

क्या साईं की पूजा करने वालो को ये पता है की सनातन धर्म में किस विग्रह की पूजा होती है किसकी नहीं??

क्या साईं भक्ति को पता है की सनातन धर्म में विग्रह स्थापना का क्या विधान है??

क्या सनातन धर्म भगवान् की तरह गुरु की पूजा करने की अनुमति देता है, जैसे की कुछ लोग इसे सिर्फ गुरु बता रहे है.

साईं भक्तो को सलाह की वो अपनी आखे खोले और इस साईं की पूजा को बंद करके सनातन धर्म के असली स्वरुप को पहचाने,

जय श्री राम,

जय भगवान परशुराम,

जय सनातन धर्म

जय हिन्दुराष्ट्रई पूजना सचमुच भक्ति या अन्धविश्वास की पराकाष्ठा??????

 

 

यह पोस्ट केवल कट्टर हिन्दुत्व का दम्भ भरने वाले उन लोगों से एक प्रश्न हैं जो साई को पूजते हैं और खुद को कट्टर हिन्दुवादी भी कहलाना पसन्द करते हैं. कृप्या वही लोग इस पोस्ट का हिस्सा बनें.]]

 

सबसे पहले कट्टरवाद तो वही है जो सिर्फ़ अपने ईश्वर, धर्म और संस्कारों में विश्वास रखे. जैसे कि मुस्लिम. मुस्लिम सम्प्रदाय को हमारे हिन्दु भगवा वस्त्रों, तिलक, मंदिरों की घंटियों, पूजा ध्वनियों इत्यादि सभी चीजों से नफ़रत है. ऐसी कोई हिन्दु वस्तु नही जिसे वे सम्मान की दृष्टि से देखें. और हम हिन्दु सुबह उठते ही एक ऐसे बाबा को पूजते हैं जो केवल मुल्ला वस्त्र ही धारण करता था. जो हमेशा मुल्ला टोपी धारण करता था. कुल मिलाकर उसके आचरण या पहनावे में कुछ भी हिन्दु था. तो हम कट्टर हिन्दुवादी कैसे हो सकते हैं?????

 

क्या हमारे हिन्दु धर्म के किसी एक संत का नाम मेरे कट्टर हिन्दु मित्र बता सकते हैं जिसे मुसलमानों ने स्वीकार किया हो????

 

साई जिसका सबसे बड़ा संदेश यही था – “सबका मालिक एक” लेकिन कौन आज तक नही पता चला. मेरे अनुसार उनका इशारा अल्लाह की तरफ़ होगा क्योकि उनका पहनावा-आचरण व्यवहार सब मुस्लिम ही था और वह रहते भी मस्जिद में ही थे तो अनुमान यही कहता है.

 

अब उनके संदेश को दूसरे तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. – “सबका मालिक एक” मतलब हिन्दु, मुस्लिम, क्रिश्चिन इत्यादि सभी धर्मों के मालिक एक ही है तो ये धर्म के बीच लड़ाई क्यों?????

 

सभी लोग भाई-बधुत्व के साथ प्यार से रहो. सभी धर्मो को पूजो. क्योंकि आपके साई के अनुसार सभी धर्मो का मालिक एक है. यदि अब भी आपकी कट्टरता सभी धर्मो को मानने को नही कहती तो आप साई का अनुसरण नही कर रहे. तो क्यों मानते हैं साई को???????

 

कोई उन्हें

 

भगवान श्रीकृष्ण

 

का अवतार मानता है, कोई राम का तो कोई शिव का. मतलब वो हिन्दु भगवान के अवतार थे. तो मस्जिद में क्या करते थे? मन्दिर में क्या परेशानी थी उन्हें? मतलब साफ़ है कि वो भी सेकूलर थे.

 

(लेकिन मेरा मानना है कि वो सिर्फ़ मुस्लिम धर्म ही मानते थे) सभी धर्मो को मानते थे. तो आप क्यों हिन्दुत्व का ड़ंका पीटते हैं? उनके आदर्शो पर क्यों नही चलते????

 

बन जाईये सेकूलर जैसा की आपके साई ने सिखाया है- “सबका मालिक एक” और अगर आपका भी मानना है कि सबका मालिक एक तो आप कट्टर धार्मिक नही है. हमारे किसी भी हिन्दु देवी-देवता ने जब भी इस पृथ्वी पर अवतार लिया लोगों को पाप और आतंक से मुक्ति दिलाई. बिना पाप का सर्वनाश किये पृथ्वी नही छोड़ी. जब पृथ्वी चारों ओर से सुरक्षित हो गई तब उन्होंने अपने धाम को प्रस्थान किया. साई ने जब पृथ्वी पर जन्म लिया तो पूरा भारत उस समय अंग्रेज़ो के डंडे खा रहा था. भारत माता गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी थी. हजारो गोमातायें रोज कटती रही. ये बचाना तो दूर उनके खिलाफ़ कभी एक शब्द तक नही बोला. आखिर क्यों ????

 

जबकि हमारे जितने भी हिन्दु संत सन्यासी हुये सभी ने कुरीतियों के खिलाफ़ आवाज उठाई. उसे समाप्त करने के लिये अपने सुखों की भी परवाह नही की. देश और समाज के लिये जीये और देश और समाज के लिये ही प्राण त्याग दिये.

 

साई ने समाज से कौन सी कुरीति को दूर किया. क्या किया देश और समाज के लिये??????

 

आखिर क्यों देश को गुलामी के हालत में छोड़ गये????? अब यदि आप कट्टर हिन्दुवादी हैं तो हिन्दु धर्म ग्रंथो को भी पूजते व मानते होंगे?

 

स्कन्द पुराण के षष्ठम् अध्याय में स्पष्ट लिखा है कि कलयुग को समाप्त करने के लिये भगवान श्रीविष्णु अपना 10वां व आखिरी ”कल्कि अवतार” लेंगे.

 

लेकिन किसी भी हिन्दु धार्मिक ग्रंथ में साई का जिक्र नही है????

 

(अगर है तो कृप्या एक प्रति मुझे भी उपलब्ध कराने की कृपा करें ) ग्रंथ लिखने वाले ऋषि मुनि यदि साई के बाद के घटनाक्रमों का उल्लेख पुराणों में कर सकते थे तो साई का क्यों नही????

 

मतलब साफ़ है कि साई का अवतारवाद से कोई वास्ता नही था और ना ही वह कोई संत था. संत वही होता है जो लोगो को भगवान से जोड़े , संत वो होता है जो जनता को भक्तिमार्ग की और ले जाये, संत वो होता है जो समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए पहल करे.

 

इस साई नाम के मुस्लिम फकीर ने जीवन में कभी भी हमारे राम या कृष्ण का नाम तक नहीं लिया और हम इस साई की काल्पनिक महिमा की कहानियो को पढ़ के इसे भगवान मान रहे हो.

 

कितनी विचित्र मानसिकता है हम हिन्दुओं की. मेरे अनुसार तो यह एक भयानक मूर्खता है.

 

इससे पता चलता है कि महान ज्ञानी ऋषि मुनियो के वंशज आज मूर्ख और कलुषित बुद्धि के हो गए है कि उन्हे भगवान और एक साधारण से मुस्लिम फकीर में फर्क नहीं आता…..

 

साईं के कुछ मुर्ख भक्त है जो साईं कटुवे को शिव राम या कृष्ण ने जोड़ रहे है और अपने सनातन धर्म का मखोल उड़ा कर पूरी दुनिया में सनातन धर्म को बदनाम कर रहे है, ऐसे साईं भक्तो को मेरा खुला चैलेंज, हिम्मत है तो साईं को हिन्दू साबित करे भगवान की बात तो बहुत दूर की है, ऐसे साईं भक्तो को मेरी सलाह, क्या ये साईं राम शिव से बड़ा हो गया,

 

क्या साईं की पूजा करने वालो को ये पता है की सनातन धर्म में किस विग्रह की पूजा होती है किसकी नहीं??

 

क्या साईं भक्ति को पता है की सनातन धर्म में विग्रह स्थापना का क्या विधान है??

 

क्या सनातन धर्म भगवान् की तरह गुरु की पूजा करने की अनुमति देता है, जैसे की कुछ लोग इसे सिर्फ गुरु बता रहे है. साईं भक्तो को सलाह की वो अपनी आखे खोले और इस साईं की पूजा को बंद करके सनातन धर्म के असली स्वरुप को पहचाने,

 

जय श्रीकृष्ण……

हमारे ३३ देवता हैं जिनकी अलग अलग पूजा होती है उनके अवतार हैं उनकी पूजा में भी कुछ अंतर होता है अत: आप हमारे संदस्क ग्रंथालय में उपलब्ध पूजा पद्धति पढें जो की मुफ्त है अधिकतर आपको भविष्य पुराण में मिल जाएगी?

आप अगरबत्ती जिसमें बांस लगी हो न जलाएं इससे वंश को हानि होती है और ए वैदिक नही है धूप दीप आदि जलाएं?

वैदिक परंपरा में हर घर में मंदिर होना ज़रूरी बताया गया है लेकिन मंदिर में रखीं ईश्वर की मूर्ति की आराधना कैसे करें, इससे जुड़े भी कई निर्देश दिए गए हैं। हम आपको बताते हैं वे विशेष बातें जिनका ध्यान अवश्य रखना ही चाहिए।

 

टूटे चावल, दीपक

पूजा में चावल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है लेकिन ये टूटे हुए नहीं होने चाहिए। चावल चढ़ाने से पहले अगर आप उन्हें हल्दी के घोल से पीला कर लेते हैं तो यह और भी शुभ है। कभी भी धार्मिक कार्य के लिए किसी खंडित वस्तु, जैसे टूटे दीपक आदि का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

 

पान का पत्ता

पूजा में पान का पत्ता बहुत उपयोगी माना गया है। पान के पत्ते में इलायची, लौंग, गुलकंद आदि भी डालकर पूजा करने से शुभ लाभ प्राप्त होते हैं।

 

पूजा का दीपक

पूजा के दौरान जलाए गए दीपक का विशेष ध्यान रखना चाहिए। दीपक के बुझने से पूजा का फल नहीं मिल पाता।

 

पूजा की सामग्री

पूजा की शुरुआत करने से पहले जिस भी देवी-देवता की पूजा की जानी है उनका आह्वान, ध्यान, आसन, स्नान, पूजा के लिए उपयोगी सामग्री, दीपक जलाना, प्रसाद आदि सभी ज़रूर होने चाहिए। जिससे आपको बार-बार उछना न पड़े।

 

 

पूजा सामग्री की सफ़ाई

देवी-देवताओं को चढ़ाए जाने वाले फूल-पत्तियों को साफ पानी से अवश्य धो लें। जिस भी भगवान की पूजा की आप तैयारियां कर रहे हैं, उनसे संबंधित सामग्रियों को जरूर शामिल करें। इसके लिए आप किसी विशेषज्ञ की सहायता ले सकते हैं।

 

आसन

जिस आसन पर बैठकर आप पूजा करने वाले हैं, उसे पैरों से नहीं अपने हाथों से खिसकाएं। पूजा स्थल के ऊपर किसी प्रकार का कूबा-कबाड़ा बिल्कुल ना रखें।

 

वास्तुदोष से मुक्ति

अगर आप घर में मौजूद वास्तुदोष से परेशान हैं तो रोज़ाना घी का दीपक जलाएं। इससे काफी हद तक घर के वास्तुदोष दूर होते हैं।

 

पंचदेव

सनातन धर्म में पंचदेव यानि गणेश, सूर्य, दुर्गा, शिव और विष्णु देव का उल्लेख किया गया है। किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले पंचदेव का ध्यान अवश्य करना चाहिए। प्रतिदिन की जाने वाली पूजा के दौरान भी इन पंचदेव का ध्यान करना सुख-समृद्धि प्रदान करता है।

 

दीपक का स्थान

पूजा के दौरान लगाया जाने वाला दीपक भगवान की मूर्ति के ठीक सामने होना चाहिए। दीपक को किसी दूसरी दिशा या इधर-उधर लगाना सही नहीं है।

 

रूई की बत्ती

अगर आप घी का दीपक जला रहे हैं तो उसमें सफेद रूई की बत्ती का उपयोग करें, वहीं अगर आप तेल का दीपक जलाते हैं तो लाल रंग की बत्ती उपयुक्त रहती है।

 

भगवान शिव की आराधना

जब आप भगवान शिव की पूजा कर रहे हैं तो आपको बिल्व पत्र जरूर चढ़ाने चाहिए, इससे आपकी मनोकामना भी जल्दी पूरी होती है। पूजा के लिए भगवान को दक्षिणा भी चढ़ाई जानी चाहिए। दक्षिणा चढ़ाते समय अपने दोनों हाथों का प्रयोग कर, अपने दोषों को त्यागने का संकल्प लें।

 

 

चमड़ा

भगवान शिव को कभी हल्दी या शंख से जल नहीं चढ़ाना चाहिए। पूजन स्थल की पवित्रता का हमेशा ध्यान रखें, चप्पल या फिर चमड़े की किसी वस्तु को पूजा स्थल में नहीं होना चाहिए।

 

विशेष स्थान

हिन्दू धर्म में जहां मूर्ति पूजा को विशेष स्थान दिया गया है वहां ईश्वर के स्वरूप और उसके पूजन का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि हिन्दू धर्म को अपनाने वाले लोगों के घर आपको प्रॉपर मंदिर या फिर अपने आराध्य देवता या देवी की मूर्ति अवश्य मिल जाएगी।

 

बहुत अलग है तरीका

 

मूर्तियों का मुख

घर के मंदिर में भगवान की मूर्तियों को कुछ इस तरह स्थापित करें कि मूर्तियों का मुख एक दूसरे के सामने ना पड़े।

 

सूरज की रोशनी

घर में मंदिर कुछ ऐसे स्थापित किया जाना चाहिए जहां ताजी हवा और सूरज की रोशनी पहुंचती हो। जिन घरों में सूर्य की किरणों का प्रवेश होता है उन घरों में दोष तो वैसे ही समाप्त हो जाते हैं।

 

नमक का प्रयोग

घर से किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को बाहर करने और घर के भीतर सुख-शांति बरकरार रखने के लिए पानी में नमक डालकर पोंछा अवश्य लगवाएं। विशेषकर जिस स्थान पर आपका मंदिर स्थापित है वहां तो जरूर ऐसा करें।

संदर्भ-इंडिया TV

 http://devwani.org

प्रत्येक चन्द्र मास की त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष व्रत रखने का विधान है. यह व्रत कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों को किया जाता है. सूर्यास्त के बाद के 2 घण्टे 24 मिनट का समय प्रदोष काल के नाम से जाना जाता है. प्रदेशों के अनुसार यह बदलता रहता है. सामान्यत: सूर्यास्त से लेकर रात्रि आरम्भ तक के मध्य की अवधि को प्रदोष काल में लिया जा सकता है.

 

ऎसा माना जाता है कि प्रदोष काल में भगवान भोलेनाथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है. जिन जनों को भगवान श्री भोलेनाथ पर अटूट श्रद्धा विश्वास हो, उन जनों को त्रयोदशी तिथि में पडने वाले प्रदोष व्रत का नियम पूर्वक पालन कर उपवास करना चाहिए.

 

यह व्रत उपवासक को धर्म, मोक्ष से जोडने वाला और अर्थ, काम के बंधनों से मुक्त करने वाला होता है. इस व्रत में भगवान शिव की पूजन किया जाता है. भगवान शिव कि जो आराधना करने वाले व्यक्तियों की गरीबी, मृ्त्यु, दु:ख और ऋणों से मुक्ति मिलती है.

 

प्रदोष व्रत की महिमा

 

शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दौ गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि " एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. तथा व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यो को अधिक करेगा.

 

उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी. इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है.

 

प्रदोष व्रत से मिलने वाले फल

 

अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है. जैसे

 

सोमवार के दिन त्रयोदशी पडने पर किया जाने वाला वर्त आरोग्य प्रदान करता है. सोमवार के दिन जब त्रयोदशी आने पर जब प्रदोष व्रत किया जाने पर, उपवास से संबन्धित मनोइच्छा की पूर्ति होती है. जिस मास में मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो, उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थय लाभ प्राप्त होता है. व बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपवासक की सभी कामना की पूर्ति होने की संभावना बनती है.

 

गुरु प्रदोष व्रत शत्रुओं के विनाश के लिये किया जाता है. शुक्रवार के दिन होने वाल प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिये किया जाता है. अत में जिन जनों को संतान प्राप्ति की कामना हो, उन्हें शनिवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए. अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किये जाते है, तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है.

 

प्रदोष व्रत विधि

 

प्रदोष व्रत करने के लिये उपवसक को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए. नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें. इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है. पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किये जाते है.

 

ईशान कोण की दिशा में किसी एकान्त स्थल को पूजा करने के लिये प्रयोग करना विशेष शुभ रहता है. पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है. अब इस मंडप में पद्म पुष्प की आकृ्ति पांच रंगों का उपयोग करते हुए बनाई जाती है.

 

प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिये कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है. इस प्रकार पूजन क्रिया की तैयारियां कर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए. पूजन में भगवान शिव के मंत्र "ऊँ नम: शिवाय" इस मंत्र का जाप करते हुए शिव को जल का अर्ध्य देना चाहिए.

 

प्रदोष व्रत समापन / उद्धापन करना

 

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है.

 

प्रदोष व्रत उद्धापन करने की विधि

 

इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का समापन करना चाहिए. इसे उद्धापन के नाम से भी जाना जाता है.

 

इस व्रत का उद्धापन करने के लिये त्रयोदशी तिथि का चयन किया जाता है. उद्धापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. प्रात: जल्द उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों या पद्म पुष्पों से सजाकर तैयार किया जाता है. "ऊँ उमा सहित शिवाय नम:" मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए, हवन किया जाता है. हवन में आहूति के लिये खीर का प्रयोग किया जाता है

 

हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है. और शान्ति पाठ किया जाता है. अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है. तथा अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशिर्वाद प्राप्त किया जाता है.

अक्सर हमे कइ जगह देखने ओर सुनने को मिलता है कि किसी के शरीर में भैरव जी, देवि , हनुमान जी आदिदेवि देवताओं का प्रवेश होता है ।

ओर लोग अपनी समस्याओं का हल पूछने जाया करते है ।

हकीकत क्या है जानिये:--पहली बात ये हे कि जिस प्रकार हमें जानवरों के शरीर से दुर्गन्ध आया करति है, ठीक वेसे ही देवताओं को हमारे शरीर से गन्ध आती है । क्यों कि हमारा शरीर दिखता सुन्दर है जब किभीतर केवल रक्त, माँस, हड्डी, मज्जा, वीर्य, चर्बीभरी हुई है । देवताओं का शरीर अग्नि तत्व प्रधान होता है ।

दूसरी बात यह है कि किसी भी मनुष्य में इतनी शक्तिओर सामर्थ्य नहीं है कि वो देवि देवताओं का तेज सहनकर सके ।अगर वास्तव में देवि देवता आजाये तो शरीर में बम ब्लास्ट हो जायेगा ।

यहाँ तक यह तो साफ हो गया कि देवि देवता नहीं आतेहै ।

अब आता क्या है वो जानिये :--प्रथम बात आज के समय में 95% लोग देवि देवताओं के शरीर में आने का ढोंग करते है । केवल 5% ही सच्चे होतेहै । इन पाँच % में जो आता है उसे कहते है भाव ।

भाव का अर्थ मन में आने वाले अपने ईष्ट के प्रतिविचार। जब ईष्ट का ध्यान किया जाता है तो उसईष्ट देव या देवि कि तरंगे मन में उठने लगति है , जोशआने लगता है , यही जोश ओर भाव दिलाने के लिये पहलेउस व्यक्ति को संबंधित देवि देवता के भजन सुनाये जातेहै । ओर वह व्यक्ति भजनों को सुनकर अपने ईष्ट देव केरंग में रंगने लगता है । जिसे सभी लोग यही समझते हैकि इसमें बालाजी, भैरव जी आचुके है ।

एसा भाव आप मेंभी आ सकता है आप चाहे तो । आपका आपके ईष्टदेव केप्रति अनन्य प्रेम होना चाहिये । आप जोश के साथ हनुमान चालिसा का जोर जोर से बोलकर पाठ करो,100% आपको कुछ क्षण के लिये एसा लगेगा कि आपके शरीर में हनुमान जी आ रहे है । आप दुर्गा सप्तशती का पाठ जोश में माता जी के सामने बेठ कर करो, जितनी देर तक आप पाठ करोगे उतनी देर तक आपका शरीरआपको देवि मय लगेगा ।

दूसरी बात कइ लोगों में आते तो भूत प्रेत, जिन्द है

लेकिन वो नाम देवि- देवताओं का कर दिया करते है ।ओर कई लोग केवल जनता को ठगने ओर लूटने के लिये गर्दन हिलाया करते है ।

""यही है देवि देवताओं के शरीर में आने का रहस्य ।

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वार्ताः

निम्न भाषाओं में लिखें:

अभिनंदनम्

सुस्वागतम्

संस्कृत भाषाया: संजालिय विकास हेतु वयम् भारतीय जनान् एकिभूय संस्कृतम् विश्वव्यापी भाषा रचयाम:।अतः भवताम् योगदानं आवश्यकम् अस्ति।संस्कृत भाषा एतादृशी भाषा अस्ति या चतुर्वेर्दै:एकादश उपनिषदै: एवम् लक्ष ग्रन्थै: पवित्रां भवति।अस्याम् भाषायाम् अष्टोत्तर शतवर्णा: भवन्ति ये सूर्यस्य किरणै: च हिन्दू देवता शंकरस्य ढक्का द्वारा उत्पन्ना: अभवन् तत्कालीन समये एताम् भाषाम् मातृभाषा अमन्यत् परम् अद्यत्वे भारत एषा भाषा जीविता अस्ति।अतः अस्या: देवभाष्या:समुचित विकास एवं पुनरुद्धार हेतु एकम् संगठनं संचालितं येन संजालस्य माध्यमेन देववाणी संस्कृतम् जन भाषा भवेत्। यतोहि एषा भाषा एतादृशी भाषा अस्ति येन नासा सहित विश्वस्य अनेक संस्थानै: सिद्ध: कृत: यत् एषा एक ब्रह्माण्डस्य सर्वोतमा भाषा अस्ति । अतः एतस्य: सुमधुरं च सुंदरम् वैज्ञानिक भाषाया: विकास हेतु स्व अमूल्य समयः आवश्यकः। विश्वस्य उपलब्धासु भाषासु संस्कृतभाषा प्राचीनतमा भाषास्ति। भाषेयं अनेकाषां भाषाणां जननी मता। प्रचीनयो: ज्ञानविज्ञानयो: निधि: अस्यां सुरक्षितः। संस्कृतस्य महत्वविषये केनापि कथितम्-'भारतस्य प्रतिष्ठेद्वे संस्कृतं संस्कृतस्तथा'; इयं भाषा अतीव वैज्ञानिकी। केचन कथयन्ति यत् संस्कृतमेव संग्णकस्य कृते सर्वोत्तमा भाषा।अस्या: वाङ्मयं वेदै:, पुराणै:, नीतिशास्त्रै: चिकित्साशास्त्रादिभीश्च समृद्धमस्ति।कालिदासादीनां विश्वकवीनां काव्यसौन्दर्यम् अनुपमम्। कौटिल्यरचितम् अर्थशास्त्रं जगति प्रसिद्धमस्ति। गणितशास्त्रे शून्यस्य प्रतिपादनं सर्वप्रथमम् आर्यभट: अकरोत्। चिकित्साशास्त्रे चरकसुश्रुतयो: योगदानं विश्वप्रसिद्धम्। संस्कृते यानि अन्यानि शास्त्राणि विद्यन्ते तेषु वास्तुशास्त्रं, रसायनशास्त्रं, खगोलविज्ञानं, ज्योतिषशास्त्रं, विमांशास्त्रम् इत्यादीनि उल्लेखनियानि।संस्कृते विद्द्ममानाः सूक्तयःअभ्युदयाय प्रेष्यन्ति,यथा - सत्मेव जयते,वसुधैव कुटुम्बकम्, इत्यादयः।सर्वभूतेषु आत्मवतं व्यवहारंकर्तुं संस्कृत भाषा सम्यक् शिक्षयति।महापुरूषाणां मतिः,उत्मजनानां धृतिः जीवनपद्धतिः च वर्णितः सन्ति।अतः अस्माभिः संस्कृतम् अवश्यमेव पठनीयम्।तेन मनुष्यस्य समाजस्य च परिष्कारः भवेत।
यतोहि एतम् अलंकारम् लुप्तस्थ उपरान्त वयम् कांतिहीना: भविष्याम:।अतः भवताम् संस्कृत: समाजिक, चलचित्र, पुस्तकम्, संस्कृतवार्ताः ,संस्कृत देवनागरी अक्षर परिवर्तन यादृशी सर्वा: महत्वपूर्ण सुविधा: उपलब्धा: सन्ति। भवताम्  कृते संस्कृत सुविधा: उपलब्धा: सन्ति। भवताम् कृते संस्कृत वातावरण उपलब्ध: कारयितुम्  प्रतिबद्ध: स्म:। यदि  भवान  संस्कृत  भाषा  जनाति यदि भवत: पार्श्वे करियत: उपकरणम् उपलब्धम्  अस्ति तर्हि अवश्यमेक: प्रेषयन्तु भवताम् योगदानं देशहितम् अविस्मरणीयं भविष्यति। संजाल मेलThis email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it..
 
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